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Wilma Rudolph-“जिन्होंने साबित कर दिया कि Nothing is Impossible!

आइए दोस्तों ! आज हम आपको एक ऐसी महिला के बारे में बताने जा रहे हैं जिसने यह साबित कर दिया कि दुनिया में कुछ  भी असंभव नहीं है।  

“विल्मा रुडोल्फ” का जन्म अमेरिका के एक गरीब घर में हुआ था। लगभग चार साल की उम्र में विल्मा रूडोल्फ को पोलियो हो गया और वह विकलांग हो गई।  विल्मा रूडोल्फ तब केलिपर्स के सहारे चलती थी। डाक्टरों ने भी हार मान ली और कह दिया कि वह कभी भी जमीन पर चल नहीं सकती ।

विल्मा रूडोल्फ की मां ने विल्मा रूडोल्फ को प्रेरित किया और कहा कि “तुम कुछ भी कर सकती हो और इस संसार में नामुमकिन कुछ भी नहीं है। तभी विल्मा रूडोल्फ ने अपनी माँ से कहा कि ‘‘क्या मैं दुनिया की सबसे तेज धावक बन सकती हूं ?’’ उसकी माँ ने कहा कि “ईश्वर पर विश्वास, मेहनत और लगन से तुम जो चाहो वह प्राप्त कर सकती हो” !



विल्मा रूडोल्फ ने लगभग नौ साल की उम्र में जिद करके अपने ब्रेस निकलवा दिए और चलना प्रारम्भ कर दिया। चलने के प्रयास में वह कई बार चोटिल भी हुई एंव दर्द को सहन करती रही लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी एंव लगातार उनकी कोशिश जारी रही। लगभग एक-दो वर्ष बाद उन्होंने खुद पर जीत हासिल कर ली और वह बिना किसी सहारे के चलने में कामयाब हो गईं।

विल्मा रूडोल्फ ने 13 वर्ष की उम्र में अपनी पहली दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और सबसे अंतिम स्थान पर आयीं। लेकिन उन्होंने फिर भी हार नहीं मानी और लगातार दौड़ प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती गयीं। कई बार हारने के बावजूद वह पीछे नहीं हटी और कोशिश करती चली गईं। आखिरकार एक ऐसा दिन भी आया जब उन्होंने प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पर आकर विजयी हासिल किया।

लगभग 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने टेनेसी राज्य विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। जहाँ उन्हें कोच ‘एड टेम्पल’ मिले| विल्मा ने टेम्पल को अपनी इच्छा बताई और कहा कि वह सबसे तेज धाविका बनना चाहती हैं। कोच ने तभी जवाब दिया -‘‘तुम्हारी इसी इच्छाशक्ति की वजह से तुम्हे कोई भी नहीं रोक सकता और मैं इसमें तुम्हारी मदद जरूर करूँगा”.

विल्मा ने लगातार कड़ी मेहनत की एंव आख़िरकार उन्हें ओलम्पिक में भाग लेने का मौका मिल गया। विल्मा का सामना जुत्ता हेन (धाविका) से हुआ जिसे  अभी तक कोई भी नहीं हरा सका था। पहली रेस 100 मीटर की थी जिसमे विल्मा ने ‘जुत्ता हेन’ को हराकर स्वर्ण पदक जीत लिया और दूसरी रेस जो कि 200 मीटर की थी उसमे भी विल्मा ने ‘जुत्ता हेन’ को हराकर दूसरा स्वर्ण पदक जीत लिया| तीसरी दौड़ 400 मीटर की रिले रेस थी और विल्मा का मुकाबला एक बार फिर जुत्ता हेन से ही होना था। रिले में रेस का आखिरी हिस्सा टीम का सबसे तेज एथलीट ही दौड़ता है। विल्मा की टीम के तीन लोग रिले रेस के शुरूआती तीन हिस्से में दौड़े और जब विल्मा के दौड़ने की बारी आई, उनसे बेटन छूट गयी। विल्मा ने देखा कि दुसरे छोर पर ‘जुत्ता हेन’ तेजी से दौड़ी चली आ रही है। तभी विल्मा ने जल्दी से गिरी हुई बेटन उठायी और तेजी से दौड़ते हुए ‘जुत्ता हेन’ को तीसरी बार भी हरा दिया और अपना तीसरा स्वर्ण पदक जीत लिया ।

Moral:- एक विकलांग महिला जिसे डॉक्टरों ने साफ़ कह दिया था कि वह कभी चल नहीं पायेगी और वह विश्व की सबसे तेज धाविका बन गयी और यह भी साबित कर दिया की “इस दुनिया में कुछ भी नामुमकिन  नहीं है” |


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