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कृष्ण दीवानी “मीराबाई” का जीवन परिचय !

मीराबाई हिंदी साहित्य जगत की कवियत्रियों में अग्रणीय स्थान रखती हैं | मीराबाई ने इस संसार को कई कविताएं, दोहे, पद आदि प्रदान किए हैं जिनका यह संसार सदैव ऋणी रहेगा। इनकी कविताएं, दोहे एवं पद प्रमुखता कृष्ण भक्ति पर आधारित है | महान कवयित्री मीराबाई का जन्म वर्ष 1573 में जोधपुर में चोकड़ी नामक गाँव में हुआ था। मीरा बाई 16वी शताब्दी की हिन्दू आध्यात्मिक कवियित्री और भगवान कृष्णा की भक्त थी। लोगो के अनुसार संत मीराबाई एक आध्यात्मिक कवियित्री थी और उत्तर भारतीय हिन्दू परंपरा के अनुसार वह एक भक्ति संत थी। इनका बचपन से ही कृष्णभक्ति में रुचि थी एवं यह मंदिरों में जाकर वहाँ मौजूद कृष्णभक्तों के सामने कृष्ण जी की मूर्ति के आगे नाचती रहती थीं। मीराबाई दिन-रात कृष्णा भक्ति में ही लीन रहती और कृष्णा को ही अपना पति मानती थी। भगवान कृष्णा के रूप का वर्णन करते हुए संत मीराबाई हजारो भक्तिमय कविताओ की रचना की है। 


पूरा नाम : मीराबाई !


जन्मस्थान : कुडकी (राजस्थान) !


माता-पिता : विरकुमारी एवं रतनसिंह !


विवाह : महाराणा कुमार भोजराज !


 मीराबाई माता-पिता की एकलौती संतान :

मीराबाई के पिता रतन सिंह राठौर छोटे राजपूत साम्राज्य कुडकी, जिला पाली, राजस्थान के शासक थे। उनकी माता का देहांत मीरा के बचपन में ही हो गया था और मीरा ही अपने माता-पिता की एकलौती संतान थी। संगीत, धार्मिक, राजनितिक और सरकार पर उन्होंने काफी अभ्यास कर रखा था।



मीराबाई का विवाह :

उनके पिता ने ही उनका पालन-पोषण किया था, जो भगवान विष्णु के भक्त थे। इच्छा न होते हुए भी 1516 में मीरा का विवाह भोज राज से हुआ था, जो मेवार के राजकुमार थे।

मीराबाई के पति की मृत्यु

1518 में हिन्दू-मुस्लिम के बीच हुए युद्ध में उनके पति की मृत्यु हो गयी थी। उनके पति के देहांत के कुछ वर्षो बाद ही उनके पिता और ससुर दोनों की ही मृत्यु हो गयी थी, बाबर की इस्लामिक सेना से युद्ध के दौरान ही उनके पिता और ससुर की मृत्यु हुई थी।

मीराबाई को फाँसी :

उनके ससुर की मृत्यु के बाद विक्रम सिंह मेवाड़ के शासक बने थे। प्रसिद्ध लेखो के अनुसार उनके ससुराल वालो ने कई बार मीरा को फाँसी देने की कोशिश भी की थी !

मीराबाई को जहर :

जहर पिलाने की और जहर का गिलास देते समय कहते थे की यह मधु (अमृत) है और उन्हें फूलो से भरी बास्केट में साँप डालकर भेजते थे। संचरित्र लेखन के अनुसार, मीरा को कभी भी इन सारी चीजो से कोई हानि नही हुई।

 मीराबाई ने की खुद ही डूबने कोशिश :

विक्रम सिंह ने मीरा को खुद ही डूबने के लिये भी कहा था, उनके कहने पर मीराबाई ने ऐसा करने की कोशिश भी की थी लेकिन उन्होंने स्वयं को पानी के उपर ही तैरता हुआ पाया।

मीराबाई का घर से निकाला जाना :

मीराबाई का कृष्णभक्ति में नाचना और गाना राज परिवार को अच्छा नहीं लगा। घर वालों के इस प्रकार के व्यवहार से परेशान होकर वह द्वारका और वृंदावन गईं। वह जहाँ जाती थीं, वहाँ लोगों का सम्मान मिलता था। लोग आपको देवियों के जैसा प्यार और सम्मान देते थे।



मीराबाई का तुलसीदास को पत्र:-

स्वस्ति श्री तुलसी कुलभूषण दूषन- हरन गोसाई।

बारहिं बार प्रनाम करहूँ अब हरहूँ सोक- समुदाई।।

घर के स्वजन हमारे जेते सबन्ह उपाधि बढ़ाई।

साधु- सग अरु भजन करत माहिं देत कलेस महाई।।

मेरे माता- पिता के समहौ, हरिभक्तन्ह सुखदाई।

हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए समझाई।।

तुलसीदास द्वारा मीराबाई के पत्र का जवाब  :-

जाके प्रिय न राम बैदेही।

सो नर तजिए कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेहा।।

नाते सबै राम के मनियत सुह्मद सुसंख्य जहाँ लौ।

अंजन कहा आँखि जो फूटे, बहुतक कहो कहां लौ।।

मीराबाई 16 वी शताब्दी की महान कवियित्री :

मीरा बाई 16 वी शताब्दी की हिन्दू आध्यात्मिक कवियित्री और भगवान कृष्णा की भक्त थी। लोगो के अनुसार संत मीराबाई एक आध्यात्मिक कवियित्री थी और उत्तर भारतीय हिन्दू परंपरा के अनुसार वह एक भक्ति संत थी।

 भक्तिकाल की संत मीराबाई :

मीराबाई भक्तिकाल की एक ऐसी संत थी जिनका सबकुछ कृष्णा के लिये समर्पित था, यहाँ तक की कृष्णा को ही वह अपना पति मान बैठी थी। भक्ति का ऐसा स्वरुप हमें बहुत कम देखने को मिलता है। मीराबाई के बालपन में कृष्णा की ऐसी छवि बैठी थी के किशोरावस्था से लेकर मृत्यु तक उन्होंने कृष्णा को ही अपना सबकुछ माना था।

भक्तिकाल की साहित्यिक रचना :

इन्होंने अपने बहुत से पदों की रचना राजस्थानी मिश्रित भाषा में ही है। इसके अलावा कुछ विशुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा में भी लिखा है।

मीराबाई द्वारा लिखित ग्रंथ :-

नरसी का मायरा

गीत गोविंद टीका

राग गोविंद

राग सोरठ के पद

मीराबाई के गीतों का संकलन “मीराबाई की पदावली” नामक ग्रन्थ में किया गया है।


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