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रामायण के रचयिता “महर्षि वाल्मीकि” का जीवन परिचय

रामायण के रचयिता “महर्षि वाल्मीकि” का जीवन बहुत ही रोचक व प्रेरणादायक है और आज हम उनके इस लेख में जानेंगे कि कैसे वह डाकू रत्नाकर से महर्षि वाल्मीकि बन गए और रामायण जैसे बड़े महाकाव्य की रचना भी कर डाली ।

हिन्दू पंचांग के अनुसार वाल्मीकि जयंती आश्विनी माह की पुर्णिमा के दिन धूमधाम से मनाया जाता है। वैसे तो वाल्मीकि जयंती दिवस पूरे भारत देश में उत्साह से मनाई जाती है लेकिन उत्तर भारत में इस दिवस को और ज्यादा धूमधाम से मनाया जाता है। उत्तर भारतीय लोग वाल्मीकि जयंती को ‘प्रकट दिवस’ के रूप में मनाते हैं। महर्षि वाल्मीकि “आदिकवि” के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। उनको यह उपाधि सर्वप्रथम ‘श्लोक’ निर्माण करने पर दी गयी थी।  


नाम : महर्षि वाल्मीकि !


अन्य प्रसिद्ध नाम : रत्नाकर, अग्नि शर्मा !


जन्म : त्रेता युग !


माता-पिता : चर्षणी ,प्रचेता !


उपलब्धियां : आदि कवी एवं  वाल्मीकि रामयण के रचयिता !


वैदिक काल के महान ऋषि :

valmiki rishi

वाल्मीकि ऋषि वैदिक काल के महान ऋषि बताए जाते हैं। धार्मिक ग्रंथ और पुराण अनुसार वाल्मीकि नें कठोर तप अनुष्ठान सिद्ध कर के महर्षि पद प्राप्त किया था। परमपिता ब्रह्मा जी की प्रेरणा और आशीर्वाद पा कर वाल्मीकि ऋषि नें भगवान श्री राम के जीवनचरित्र पर आधारित महाकाव्य रामायण की रचना की थी। ऐतिहासिक तथ्यों के मतानुसार आदिकाव्य श्रीमद वाल्मीकि रामायण जगत का सर्वप्रथम काव्य था।महर्षि वाल्मीकि नें महाकाव्य रामायण की रचना संस्कृत भाषा में की थी।



वाल्मीकि ऋषि का बचपन :

कहा जाता है कि वाल्मीकि महर्षि कश्यप और अदिति के नौंवे पुत्र प्रचेता की संतान हैं। उनकी माता का नाम चर्षणी और भाई का नाम भृगु था। बाल्यान में ही  उन्हे एक भील चुराकर ले गया था और उनका लालन-पालन भी भील प्रजाति में ही हुआ। इसी कारण से वह बड़े होकर डाकू रत्नाकर बन गए। 

रत्नाकर से कैसे बने महर्षि  :

valmiki and naradmuni

भील प्रजाति में पूरा बचपन बिताकर वाल्मीकि डाकू रत्नाकर बन गए और वह लोगों के साथ लूटपाट करके अपना गुजारा चलाते थे और तो और वह कई बार  लोगों की हत्या भी कर देते थे। एक बार जंगल में किसी नए शिकार की खोज में थे तब उनका सामना नारद जी से हुआ। रत्नाकर नें लूटपाट के इरादे से नारद मुनि को बंदी बना लिया। नारद जी नें उन्हे रोकते हुए पूछा कि “यह सब पाप कर्म तुम क्यों कर रहे हो?” तभी रत्नाकर नें कहा कि “यह सब मैं अपने स्वजनों के लिए कर रहा हूँ”।

यह सुनकर नारद जी का कहना था – “क्या तुम्हारे इस पाप के भुगतान में तुम्हारे परिवारजन भी हिस्सेदार बनेंगे?” और रत्नाकर नें बिना सोचे समझे ‘हां’ बोल दिया। तब नारद जी नें रत्नाकर से कहा की एक बार अपने परिवार वालों से पूछ लो, फिर में तुम्हें अपना सारा धन और आभूषण अर्पण करके चला जाऊंगा।

रत्नाकर नें उसी वक्त अपने हर एक स्वजन के पास जाकर अपने पाप का भागीदार होने की बात पूछी। लेकिन किसी एक नें भी हामी नहीं भरी। इस बात से डाकू रत्नाकर को काफी दुख हुआ । इसी घटना से प्रेरित होकर उनका हृदय परिवर्तन हो गया और उन्हें सारे पाप कर्म त्याग दिये एवं जप तप का मार्ग अपना कर वह कई वर्षों की कठिन तपस्या में लग गए जिसके फलस्वरूप आगे चलकर उन्हे महर्षि पद का दर्जा प्राप्त हुआ।



आदिकवि नाम से भी प्रसिद्ध :

आदिकवि शब्द ‘आदि’ और ‘कवि’ के मेल से बना है। ‘आदि’ का अर्थ होता है ‘प्रथम’ और ‘कवि’ का अर्थ होता है ‘काव्य का रचयिता’। वाल्मीकि ऋषि ने संस्कृत के प्रथम महाकाव्य की रचना की थी जो रामायण के नाम से प्रसिद्ध है। प्रथम संस्कृत महाकाव्य की रचना करने के कारण वाल्मीकि आदिकवि कहलाये।

वाल्मीकि नाम की उपाधि :

कई वर्षों तक महर्षि द्वारा तप करते समय दीमकों ने इनके ऊपर अपनी बांबी बना ली थी। तपस्या समाप्त होने पर जब ये दीमक की बांबी जिसे ‘वाल्मीकि’ भी कहते हैं, तोड़कर निकले तो लोग इन्हें वाल्मीकि कहकर पुकारने लगे और यही से इनका यह नाम प्रसिद्ध हो गया ।

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि महर्षि वाल्मीकि का नाम अग्निशर्मा था और उन्हें हर बात उलटकर कहने में मजा आता था ! इसीलिए कुछ ऋषि -मुनियों ने उन्हें “मरा” शब्द का जाप करने की सलाह दी और वे इसका उल्टा “राम…राम” का नाम जपते-जपते वह महर्षि वाल्मीकि बन गए।

रामायण लिखने की प्रेरणा :

valmiki write ramayana

अपने पाप कार्यो में हमेशा लगे रहने से रत्नाकर को हृदय परवर्तन होने पर नारद जी नें उन्हें राम नाम जपने की सलाह दी । उसके बाद रत्नाकर समाधि में बैठ कर राम नाम जप जपते जपते गलती से मरा-मरा जप करने लग जाते और इसी कारण उनका शरीर दुर्बल होता चला गया। उनके शरीर पर चीटीयां रेंगने लगी। यह सब उनके पुराने पापों का भुगतान था। घोर तपस्या के बाद जब उन्होंने ब्रह्माजी को प्रसन्न किया तब स्वयं ब्रह्मा जी नें वाल्मीकि को रामायण महाकाव्य लिखने की प्रेरणा दी।

वाल्मीकि रामायण में सात खंड है ! उन्होंने अपनी इस रचना में सिर्फ भगवान राम का ही नहीं बल्कि उस समय के समाज की दशा,सभ्यता,शासन-व्यवस्था तथा लोगो के रहन-सहन का भी वर्णन किया है! रामायण को त्रेता युग का इतिहास-ग्रन्थ भी माना जाता है !



वाल्मीकि द्वारा उनके प्रथम श्लोक की रचना :

वाल्मीकि जब नदी किनारे तपस्या करने के लिए पहुंचे तब उन्होने देखा की एक सारस पक्षी का जोड़ा प्रेमालाप में मग्न था। तभी एक शिकारी नें नर पक्षी पर बाण चलाकर उसकी हत्या कर दी। इसके पश्चात उन्होंने अपने पहले श्लोक की रचना की ।

मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥

अर्थ: “हे शिकारी ! तुमने काम में मोहित सारस पक्षी के जोड़े में से एक को मार दिया है, इसलिए तुम कभी भी प्रतिष्ठा और शांति को प्राप्त नहीं कर सकोगे”।

वाल्मीकि से जुड़े कुछ रोचक तथ्य :

1. महर्षि वाल्मीकि खगोल विद्या और ज्योतिष शास्त्र के पंडित थे।

2. सारस पक्षी के वध पर जो श्लोक महर्षि वाल्मीकि के मुख से निकला था वह परमपिता ब्रह्मा जी की प्रेरणा से निकला था। जो बात स्वयं ब्रह्मा जी नें उन्हे बताई थी। उसी के बाद उन्होने रामायण की रचना की थी।

3. इस महाकाव्य में कुल मिला कर चौबीस हज़ार श्लोक का निर्माण किया गया है।

4. महर्षि वाल्मीकि रामायण काल के थे और वे भगवान् राम से मिले भी थे! इसीलिए बहुत से लोग वाल्मीकि रामायण को ही सटीक मानते हैं।

5. श्री राम के त्यागने के बाद महर्षि वाल्मीकि नें ही माँ सीता को अपने आश्रम में स्थान देकर उनकी रक्षा की थी।

6. ऋषि वाल्मीकि नें ही श्री राम और देवी सीता के दो तेजस्वी पुत्रों लव और कुश को ज्ञान प्रदान किया था।

7. विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अनुसार त्रेता युग में जन्मे महर्षि वाल्मीकि ने ही कलयुग में गोस्वामी तुलसीदास जी के रूप में जन्म लिया था और उन्होंने “रामचरितमानस” की रचना की।



वाल्मीकि जयंती के अवसर पर कार्यक्रम :

valmiki jayanti

हर साल वाल्मीकि जयंती के दिन कई जगह शोभा यात्रा निकाली जाती है। वाल्मीकि ऋषि की स्थापित प्रतिमा स्थल पर मिठाई , भोजन, फल एवं भंडारे का विशेष आयोजन किया जाता है। इनका जीवन बुरे कर्म त्याग कर सही राह और भक्ति भाव की राह पर चलने की प्रेरणा प्रदान करता है। इसी महान संदेश को वाल्मीकि जयंती पर लोगों तक प्रसारित किया जाता है। 

महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में लव-कुश का जन्म :

valmiki luv kush

महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पुरुषोतम श्री राम के पुत्रो लव-कुश का जन्म हुआ था ! उनकी शिक्षा महर्षि वाल्मीकि की ही देख-रेख में हुई थी ! उन्होंने अपने ज्ञान और शिक्षा-कौशल से लव-कुश को छोटी उम्र में ही ज्ञानी और युद्ध-कला में निपुण बना दिया था ! उन दोनों ने श्री राम को भी अपनी वीरता और बुद्धि से आश्चर्यचकित कर दिया ! उनका यह पूरा पराक्रम महर्षि वाल्मीकि की शिक्षा का ही परिणाम था !


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  • ” महाऋषि वाल्मीकि के नाम से
    नहीं जुड़ेगा डाकू
    भगवान वाल्मीकि जी के बारे 6
    तथ्य भगवानवाल्मीकि जी के
    नाम के साथ दशकों से जुड़े डाकू शब्द की
    कंट्रोवर्सी अब खत्म…
    भगवान वाल्मीकि जी के बारे 6
    तथ्य
    भगवानवाल्मीकि जी के नाम के
    साथ दशकों से जुड़े डाकू शब्द की
    कंट्रोवर्सी अब खत्म हो गई है।
    पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने पटियाला
    की पंजाबी
    यूनिवर्सिटी की महाऋषि
    वाल्मीकि चेयर की पूर्व
    चेयरपर्सन डॉ. मंजुला सहदेव द्वारा पेश किए गए तथ्यों
    के आधार पर मीडिया को भविष्य में
    वाल्मीकि भगवान के नाम के साथ डाकू शब्द
    लगाने के आदेश दिए हैं।
    2010 में एक टीवी चैनल के
    एक सीरियल में भगवान
    वाल्मीकि जी को डाकू के रूप में
    दिखाया गया था। इस पर जालंधर के नव विकास ने चैनल पर
    पुलिस केस दर्ज करके हाईकोर्ट में याचिका दायर
    की। इस याचिका में डॉ. मंजुला सहदेव
    की रिसर्च के आधार पर यह दावा किया
    गया कि महाऋषि वाल्मीकि अपने
    जीवन में डाकू थे ही
    नहीं, इसलिए मीडिया बिना
    सही तथ्यों को जाने उन्हें डाकू के रूप
    में पेश कर रहा है जिससे पूरी दुनिया
    में वाल्मीकि समाज की धार्मिक
    भावनाएं आहत हो रही हैं।
    हाईकोर्ट ने डॉ. सहदेव के इन तथ्यों को
    सही मानते हुए चैनल पर दर्ज
    एफआईआर को बरकरार रखने के आदेश दिए। इसके बाद
    चैनल सुप्रीम कोर्ट चला गया। अब
    सुप्रीम कोर्ट ने भी इस याचिका
    पर सुनवाई करते हुए डॉ. सहदेव के तथ्यों को
    सही करार देते हुए
    वाल्मीकि भगवान को डाकू मानने से इनकार कर
    दिया है।
    वाल्मीकि भगवान पर रिसर्च करने के लिए
    पंजाब सरकार की ओर से 1995 में
    पंजाबी यूनिवर्सिटी में कायम
    की गई महाऋषि वाल्मीकि
    चेयर की पहली
    चेयरपर्सन डॉ. मंजुला सहदेव ने वाल्मीकि
    रामायण संस्कृति नाटकों में राम विषय पर
    पीएचडी की
    है। उनके द्वारा सभी शास्त्रों, वेदों का
    अध्ययन करने के बाद पंजाबी
    यूनिवर्सिटी ने उनके द्वारा
    वाल्मीकि भगवान पर लिखी
    किताब महाऋषि वाल्मीकि-एक
    समीक्षात्मक अध्ययन को छापा था।
    {वैदिक लिटरेचरसे लेकर 9वीं
    शताब्दी एडी तक कोई रेफरेंस
    प्राप्त नहीं होता जो यह साबित
    कर सके कि वाल्मीकि जी डाकू
    थे।
    {9वींशताब्दीमें इनके नाम
    वाल्मीकि के शाब्दिक अर्थ
    वाल्मीकि (दीमक
    की बांबी) की
    उत्पति का जिक्र भी कहीं
    नहीं मिलता।
    {वाल्मीकिरामायणमें उन्हें भगवान, मुनि,
    ऋषि, महाऋषि कहा गया है। उनके अपने
    महाकाव्य में भी डाकू होने का कोई
    उल्लेख नहीं है।
    {पहलारेफरेंससिकंद पुराण में मिलता है जो विद्वानों के
    मुताबिक 10वीं शताब्दी का
    है। 10वीं शताब्दी से
    पहले जब वाल्मीकि रामायण का 9 दिन का
    पाठ चलता था तो उसे शुरू करने से पहले भगवान
    वाल्मीकि की पूजा
    होती थी।
    {अगलारेफरेंसमरा मरा आध्यात्मिक रामायण में मिलता है
    जो 15वीं शताब्दी
    की है। उसके बाद आनंद रामायण
    मिलती है जो 16वीं
    शताब्दी की है।
    {भक्तिआंदोलनसाउथ में 8वीं और
    9वीं शताब्दी में शुरू हुए।
    13वीं से 16वीं
    शताब्दी में भक्तिधारा अपने चरम पर
    रही, उसी समय
    वाल्मीकि जी के बारे में यह
    कथाएं बुननी शुरू हुईं।
    डॉ. मंजुला सहदेव की रिसर्च से
    सुप्रीम कोर्ट सहमत

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