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“बहानेबाजी” से छुटकारा कैसे पाएं !

दोस्तों ! स्वागत करते हैं आपका एक बार फिर से Stayreading.Com पर। जैसा कि आपने पिछले Article में देखा कि हमने “जीत आपकी” Book से related life changing quotations डाली थी, जो आपके लिए काफी Motivated साबित रही होगी। इसी तरह आज हम आपके लिए “जीत आपकी” book से एक ऐसा Topic ढूंढ के लाएं हैं, जो आपको विजेता और बहानेबाज़ लोगों के बीच एक गहरा अंतर दर्शाएगा। दोस्तों जैसा कि आप जानते हैं इस दुनिया में ज्यादातर लोग अपने बहानाबाजी के कारण सफल ही नहीं हो पाते और बाद में अपनी किस्मत को कोसते रहते हैं। बहानेबाज़ी करने की यह बीमारी लोगों के अंदर बढती जा रही है।

जिसका सिर्फ एक ही इलाज़ है “Only Focus On Your Goal” ! एक विजेता जो होता है वह हर कार्य को बारीकी से जांच परख करता है,लेकिन कभी बहानेबाज़ी नहीं करता क्योंकि यह कार्य केवल हारने वाले लोग ही करते हैं। उनके पास काम न करने के लाखों बहानों की लम्बी-चौड़ी लिस्ट तैयार रहती है।  तो आइए दोस्तों ! हम आपको और गहराई में जाकर बताते हैं कि विजेता और बहाने बनाने वाले लोगों के बीच क्या अंतर होता है और एक बेहतरीन विजेता बनने के लिए क्या किया जाना चाहिए।      


हारने वाले व्यक्ति अक्सर ऐसे बहाने खोजते हैं :

  • मेरी किस्मत ही ख़राब है !बुरे नक्षत्रों में मेरा जन्म हुआ ! 
  • मैं बहुत छोटा हूँ ! 
  • मैं बहुत बूढ़ा हूँ ! 
  • मैं अपाहिज हूँ !
  • मैं बहुत होशियार नहीं हूँ ! 
  • मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ ! 
  • मैं सुन्दर नहीं हूँ ! 
  • मेरे ज्यादा संपर्क नहीं है ! 
  • मेरे पास पैसा नहीं है ! 
  • मेरे पास पर्याप्त पैसा नहीं है ! 
  • आर्थिक स्तिथि ठीक नहीं है ! 
  • काश, मुझे कोई मौका मिलता ! 
  • काश, मेरा परिवार न होता ! 
  • काश, मैंने ठीक जगह शादी की होती !

इस तरह के इन बहानों का कोई अंत नहीं है। 

हिंदुस्तान में बंदरों को कैसे पकड़ा जाता है ?

बन्दर पकड़ने वाले एक बक्से का इस्तेमाल करते हैं, जो ऊपर से बस इतना खुला होता है कि बन्दर का उसमें हाथ-भर जा सके। बक्से में मूंगफलियां भरी होती हैं। बन्दर मूंगफलियां हाथ में भर लेता है और इस प्रकार उसका हाथ मुट्ठी बन जाता है। बन्दर अपने हाथ को निकालने की कोशिश करता है, लेकिन खुला भाग खाली हाथ डालने के लायक तो होता है, मगर बंद मुट्ठी बाहर निकालने लायक नहीं होता। अब यह बन्दर का फैसला है कि या तो वह मूंगफली का लालच छोड़ दे और आज़ाद हो जाए या मूंगफली के लालच में मुट्ठी बांधे रखे और पकड़ा जाए। सोचिये वह हर बार क्या चुनता है ? आपने ठीक अंदाजा लगाया। वह मूंगफली के लालच में मुट्ठी नहीं खोलता और पकड़ा जाता है।




हम लोग इन बंदरों से अलग नहीं हैं। हम सभी किसी-न-किसी लालच में अटक जाते हैं, जो हमें जिंदगी में आगे बढ़ने से रोक लेता है। हम हमेशा बहानेबाज़ी करके कहते हैं, मैं यह नहीं कर सकता क्योंकि…।” और जो इस क्योंकि के बाद आता है, वह उन मूंगफलियों की तह ही होता है जो हमें करने से रोकती हैं। 

सफल लोग बहानेबाज़ी नहीं करते। दो बाते जो यह बताती हैं कि कोई कामयाब होगा कि नहीं, वे ये हैं : कारण और परिणाम। कारणों की गिनती नहीं होती सिर्फ परिणामों की होती है। जिंदगी में नाकामयाबी के लिए एक अच्छी सलाह है :न सोचो , न पूछो और न सुनों ; सिर्फ बहानेबाज़ी करो।   


इसी तरह बहानेबाज लोगों में यह कमी अक्सर देखी जाती है :


1. पिछली गलतियों से न सीखना (NOT LEARNING FROM PAST MISTAKES):    

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जो लोग इतिहास से सबक नहीं सीखते उनकी बर्बादी निश्चित है। असफलता हमें बहुत कुछ सिखा सकती है अगर हमारा नजरिया ठीक हो। असफलता रास्ते की रुकावट है, लेकिन अंत नहीं है। यह देर हो सकती है, मगर हार नहीं। हम अपनी गलतियों को अनुभव का नाम देते हैं।




कुछ लोग जीतें हैं और सीखते हैं, और कुछ सिर्फ जीते हैं और कभी नहीं सीखते। समझदार लोग अपनी गलतियों से सीखते हैं, लेकिन बुद्धिमान लोग दूसरों की गलतियों से भी सीखते हैं। हमारी जिंदगी इतनी लम्बी नहीं है कि हम सिर्फ अपनी ही गलतियों से सीखें।   

2. अवसरों को पहचानने में अयोग्यता (INABILITY TO RECOGNIZE OPPORTUNITY):

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वसर बाधाओं के रूप में आते हैं। यही वजह है कि बहुत-से लोग उन्हें पहचान नहीं पाते। याद रखें, बाधा जितनी बड़ी होगी, अवसर उतना ही बड़ा होगा।

3. डर (FEAR):

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डर काल्पनिक भी हो सकता है और वास्तविक भी। इसकी वजह से लोग अजीबों-गरीब हरकतें करते हैं, और यह ख़ासकर समझदारी की कमी के कारण होता है। डर में जीना जज़्बाती जेल में रहने की तरह है।

डर से असुरक्षा, आत्म-विश्वास की कमी और टालमटोल की सोच पैदा होती है। डर हमारी क्षमता और योग्यता, दोनों को बर्बाद करता है। हम सीधा सोच भी नहीं सकते। यह हमारे रिश्तों और सेहत को भी बर्बाद कर देता है।

कुछ जाने-पहचाने डर इस प्रकार हैं :
  • असफलता का डर ।
  • अनजानी चीज़ का डर ।
  • तैयारी न होने का डर ।
  • गलत फैसला लेने का डर ।
  • अस्वीकार किये जाने का डर ।

कुछ डर बतलाये जा सकते हैं और कुछ सिर्फ महसूस किये जा सकते हैं। डर बेचैनी को जन्म देता है, फिर इससे उलटी-सीधी सोच पैदा होती है, और यह वास्तव में, हमारी समस्या के हल को तहस-नहस कर देता है। आमतौर पर डर के जवाब में भाग जाना पसंद करते हैं। सामना न कर पाना हमें सुविधाजनक तो लगता है और थोड़ी देर के लिए डर के असर को भी कम करता है, लेकिन डर का कारण ज्यों-का-त्यों बना रहता है। काल्पनिक डर समस्याओं का आकार कई गुणा बढ़ा के दिखाता है। डर बेकाबू होकर खुशियों और रिश्तों को तोड़ सकता है।




असफल होने का डर कई बार असफलता से भी ज्यादा बुरा हो सकता है। असफलता किसी के साथ होने वाली सबसे बुरी घटना नहीं हो सकती। जो लोग कोशिश नहीं करते, वे कुछ करने से पहले ही असफल हो जाते हैं। जब छोटे बच्चे चलना सीखते हैं तो उनके बार-बार गिरने की असफलता नहीं कहा जा सकता क्योंकि वे फिर उठ जाते हैं। अगर वे बार-बार गिरने से हार मान लें तो कभी भी न चल सकेंगे। अपने पाँव पर खड़े होकर मरना अपने घुटनों पर डरकर जीने से बेहतर है।    

4. प्रतिभा का इस्तेमाल न करने की अयोग्यता (INABILITY TO USE TALENT):

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अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार कहा था, “मैं सोचता हूँ कि मैंने अपनी पूरी जिंदगी में अपनी बौद्धिक क्षमता (Intellectual Capacity) का सिर्फ 25 प्रतिशत तक ही इस्तेमाल किया। “

विलियम जेम्स के अनुसार, इंसान अपनी क्षमता (Potential) का सिर्फ 10-12 प्रतिशत ही इस्तेमाल कर पाता है। ज्यादातर लोगों की जिंदगी में सबसे दुखद बात यह है कि वे कुछ करने की इच्छा दिल में लिए हुए ही मर जाते हैं। वे जिन्दा रहकर भी जिंदगी नहीं जी पाए। वे इस्तेमाल की वजह से नहीं, बल्कि जंग लगने की वजह से ख़त्म हो जाते हैं। जंग लगकर खत्म होने के बजाय इस्तेमाल होकर ख़त्म होना कहीं अच्छा है। जिंदगी में सबसे ज्यादा दुःख और मायूसी भरे शब्द यही हैं : “काश ! मैंने किया होता !”

खाली बैठने और इंतज़ार करने में बहुत फर्क है। खाली बैठने का मतलब है- बेकारी और निकम्मापन (Passivity),जबकि धैर्य और इंतज़ार करना एक सोचा-समझा फैसला है, यह एक क्रम है और इसमें लगातार कोशिश और दृढ़ता शामिल है।

किसी ने एक बुजुर्ग से पूछा, “जिंदगी का सबसे बड़ा बोझ क्या है ?” बुजुर्ग ने उदासी से कहा, ” किसी बोझ का न होना ही सबसे बड़ा बोझ है। “

5. अनुशासन की कमी (LACK OF DISCIPLINE):

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क्या आपको कभी यह सोचकर कभी हैरानी हुई कि क्यों कुछ लोग अपने लक्ष्य पर नहीं पहुँच पाते ? वे हमेशा विपरीत और नाजुक स्तिथियों में पराजित (frustrated) क्यों महसूस करते हैं ? ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोग लगातार सफल होते रहते हैं , जबकि कुछ लोग लगातार असफल ? जीवन में जिसने भी कोई ख़ास मुकाम हासिल किया है, वह अनुशासन के बिना नहीं किया, चाहे वह खेलकूद हो , पढ़ाई-लिखाई हो या फिर व्यापर।




बिना अनुशासन के लोग बहुत कुछ करने की कोशिश तो करते हैं , मगर खुद को किसी बात के लिए कमिट नहीं करते। कुछ उदारवादी कहे जाने वाले विचारकों ने अनुशानहीनता को आज़ादी का नाम दिया है। जब भी मैं हवाई जहाज़ में सफर करता हूँ तो चाहता हूँ कि पायलट अनुशासित हो और वही करे जो उसे करना चाहिए, न कि वह जो उसका दिल करे। मैं नहीं चाहता कि उसकी फिलोसॉफी यह हो, “मैं आज़ाद हूँ, और मैं यह नहीं चाहता कि मुझे कोई कंट्रोल टॉवर से यह बताये कि मुझे क्या करना है। “

लगातार कोशिश की कमी अनुशासनहीनता है। अनुशासन में रहने के लिए आत्म-नियंत्रण और कुर्बानी की जरुरत तो है ही, साथ ही मन को भटकने से रोकने और लालच से बचने की भी जरूरत है। इसका मतलब होता है कि अपना फोकस बनाए रखें। भाप को जब तक बाँधा न जाए, तब तक इंजन नहीं चल सकता। नियाग्रा फाल्स (Niagara Falls) से तब तक बिजली नहीं बनेगी जब तक उसके बहाव को बाँधा न जाए।  

खरगोश और कछुए की कहानी हम सभी जानते हैं। खरगोश अपनी तेज़ चाल की डींगे हाँका करता था और एक दिन उसने कछुए को दौड़ के लिए चैलेंज (Challenge) किया। कछुए ने उस चैलेंज को क़ुबूल कर लिया। उन्होंने एक लोमड़ी को अपना जज बनाया, जिसने यह तय किया कि दौड़ कहाँ से शुरू होगी और कहाँ ख़त्म होगी। दौड़ शरू हुई और कछुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा। खरगोश ने तेज़ दौड़ लगायी और कछुए को बहुत पीछे छोड़ दिया, और फिर सोचा कि एक झपकी ले लूँ क्योंकि उसे पूरा भरोसा था कि दौड़ वही जीतेगा। जब वह सोकर उठा तो उसे दौड़ की याद आयी और वह तेज़ी से भागा, मगर उसने देखा कि कछुआ दौड़ ख़त्म करके पहले ही जीत चुका है।     

अनियमित कड़ी मेहनत से कहीं बेहतर नियमित रूप से की गई थोड़ी-सी कोशिश, जो अनुशासन से आती है। अनुशासन और पछतावा, दोनों ही दुखदायक हैं। ज्यादातर लोगों की इन दोनों में से किसी एक को चुनना होता है। जरा सोचिये, इन दोनों में में कौन ज्यादा तकलीफदेह है ?    

आमतौर पर वे बच्चे जो ज्यादा आज़ादी और अनुशासन के संतुष्ट पलते हैं, वे न तो अपना आदर कर पाते हैं, और न ही माता-पिता और समाज का, और उन्हें अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना बहुत मुश्किल लगता है।     

6. कमजोर स्वाभिमान (POOR SELF-ESTEEM) :

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कमजोर स्वाभिमान का मतलब है- आत्म-सम्मान और आत्म-महत्त्व की कमी। स्वाभिमान की कमी होने पर लोग खुद से और दूसरों से दुराचार (illtreat) करते हैं। अहंकार चालक (driver) बन जाता है। तब हर फैसले अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए किये जाते हैं बजाए किसी महत्वपूर्ण काम के। स्वाभिमान की कमी वाले लोग हमेशा पहचान (Identity) बनाने की जोड़-तोड़ में रहते हैं। वे खुद को तलाशने में लगे रहते हैं। खुद को तलाशा नहीं जाता, बल्कि बनाया जाता है।




निकम्मापन और आलस्य कमज़ोर स्वाभिमान का नतीजा होते हैं और बहानेबाज़ी भी इसी का नतीजा होती है निकम्मापन उस जंग की तरह है जो बढ़िया से बढ़िया लोहे को भी खा जाती है।

7. ज्ञान की कमी (LACK OF KNOWLEDGE) :

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अज्ञानता के क्षेत्र की जानकारी ज्ञान की तरफ बढ़ाया गया पहला कदम है। एक व्यक्ति अपना ज्ञान जितना बढ़ाता है, उतना ही उसे पता चलता है कि वह किन-किन क्षेत्रों में अज्ञानी है। वह व्यक्ति जो यह सोचता है कि वह सब कुछ जानता है, उसे ही सबसे ज्यादा सीखने की जरुरत है।

अज्ञानी लोग नहीं जानते कि वे अज्ञानी हैं। वे नहीं जानते कि वे नहीं जानते हैं। अगर देखा जाए तो अज्ञानता से ज्यादा बड़ी समस्या है- ज्ञान होने का भ्रम होना, जो व्यक्ति को गुमराह कर सकता है।

8. भाग्यवादी नजरिया (FATALASTIC ATTITUDE) :

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भाग्यवादी नजरिया लोगों की जिंदगी में जिम्मेदारी स्वीकार करने से रोकता है। वे सफलता और असफलता, दोनों को ही किस्मत का नतीजा मानते हैं। वे खुद को किस्मत के भरोसे छोड़ देते हैं। वे कुंडली और ग्रहों में लिखी नियति में यकीन करते हैं और ऐसा मानते हैं कि चाहे वे कुछ न करें, जो होना है वह तो होकर ही रहेगा। इसलिए वे कभी कोशिश नहीं करते और आत्म-संतुष्टि उनकी जिंदगी का तरीका बन जाती है। वे काम करने के बजाए कुछ होने का इंतज़ार करते हैं। किसी भी हारने वाले से पूछने तो वह यही कहेगा कि सफलता तो किस्मत से मिलती है।

कमजोर इरादे वाले लोग ज्योतिषियों, बहुरूपियों ,ग्रह-नक्षत्रों और पंडितों के शिकार बनकर आसानी से उनके चंगुल में फंस जाते हैं। ऐसे घटिया लोग ही, जो इंसान के रूप में शैतान हैं, इन लोगों का नाज़ायज़ फायदा उठाते हैं। नासमझी की वजह से ये अंधविश्वास, ढोंगी आडंबरों और ढकोसलों में फंसे रहते हैं।




घटिया लोग भाग्य में विश्वास करते हैं। हिम्मती और पक्के इरादों वाले लोग वजह और उसके नतीजों (Cause and Effect) में भरोसा करते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि खरगोश का पैर भाग्यशाली (Lucky) है, लेकिन क्या वह खरगोश के लिए भी भाग्यशाली होता है ?

9. उद्देश्य की कमी (LACK OF PURPOSE) :

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अगर हम उन लोगों की कहानियां पढ़ें जो अपनी गंभीर अपाहिजता (disability) से उबरे , तो यह इस बात का सबूत है कि सफल होने की गहरी इच्छा ही इनके आगे बढ़ने के लिए ड्राइविंग फाॅर्स रही। इनके जीवन का एक उद्देश्य था। ये साबित करना चाहते थे कि किसी भी तरह की मुश्किलों के बावजूद कुछ कर दिखाएंगे, काम करते रहेंगे-और उन्होंने ऐसा कर दिखाया।

  • इच्छा-शक्ति ने ही पोलियोग्रस्त विल्मा रुडोल्फ (Wilma Rudolph) को 1960 के ओलम्पिक में सबसे तेज़ दौड़ने वाली एथलीट बनाया, जिसने तीन गोल्ड मैडल जीते थे।
  • ग्लेन कंनिंगघम (Glen Cunningham) के मुताबिक, “इच्छा-शक्ति की बदौलत ही एक मील की दौड़ में एक लड़का, जिसके पैर जले हुए थे, विश्व रिकॉर्ड बना सका।”
  • पांच साल की एक पोलियोग्रस्त बच्ची ने अपने पैरों की ताकत दोबारा पाने के लिए तैराकी शुरू की। अपने सफल होने की गहरी इच्छा की वजह से ही उसने 1956 के मेलबोर्न ओलम्पिक प्रतियोगिता की तीन अलग-अलग बाजियों में गोल्ड मैडल जीते और रिकॉर्ड भी बनाया। उसका नाम है, शैली मान (Shelly mann) ।

जब लोग बिना उद्देश्य के और दिशाहीन होते हैं तब वे अवसरों को देख नहीं पाते। अगर किसी व्यक्ति में कुछ पाने की इच्छा हो, अपने लक्ष्य तक पहुँचने की दिशा हो, फोकस पर टिकने की लगन हो, और कड़ी मेहनत के लिए जरुरी अनुशासन हो तो बाकी चीज़ें आसान हो जाती हैं। लेकिन अगर आप में ये गुण नहीं है तो आपकी बाकी सारी खूबियां बेकार हैं।




चरित्र ही वह नींव है जिस पर पूरी ईमारत खड़ी होती है। यह स्थाई है।

10. साहस की कमी (LACK OF COURAGE) :

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सफल लोग चमत्कारों या आसान रास्तों की फिराक में नहीं रहते। ये मुसीबतों से उबरने के लिए साहस और हिम्मत जुटाते हैं। वे यह देखते हैं कि बाकी क्या बचा है, बजाए इसके कि क्या खो गया है। आशाएं सच नहीं होती, मगर दृढ़ता और संकल्प और उम्मीद के आधार पर विश्वास जरूर पूरे होते हैं। वही प्रार्थना सफल होती है जिसका आधार हौसले से किया गया काम हो। सफलता पाने के लिए हौसला और चरित्र बेजोड़ मेल हैं। यही साधारण और असाधारण में फर्क है।

जब हमारा मन साहस से भरा हुआ हो तो हम अपने डर और रास्ते की मुश्किलों से उबर जाते हैं। हिम्मत का मतलब डर का न होना नहीं है, हिम्मत का मतलब तो डर पर काबू पाना है। साहस के बिना चरित्र बेअसर होता है, जबकि चरित्र, इन्साफ और ईमानदारी के बिना साहस अत्याचार है।


कुछ लोग सोचते हैं कि वे सिर्फ बदकिस्मत हैं :


यह भाग्यवादी नज़रिये को जन्म देता है। जो लोग आधे-अधूरे मन से काम करते हैं,वह अक्सर ऐसा करते हैं :

  • मैं कोशिश करूँगा।
  • मैं देखूंगा कि यह होता है या नहीं। 
  • मैं एक बार करके देखूंगा। 
  • मेरा क्या जाता है। 
  • मैंने वैसे भी ज्यादा कोशिश नहीं की।

ऐसे लोग निश्चित रूप से असफल होते हैं क्योंकि ये अपने काम को समर्पण और दृढ इच्छा के बिना करते हैं। इनमे हिम्मत, कमिटमेंट और विश्वास की कमी होती है।  काम चलाऊ भाव से काम करने से ये संतुष्ट हो जाते हैं और खुद को बदकिस्मत कहते हैं।  

इसी से सम्बंधित हम आपको एक कहानी बताते हैं :

एक आदमी ने रेस का घोड़ा खरीदा और उसे अस्तबल में बाँध दिया और वहां एक साइन बोर्ड लगा दिया जिस पर लिखा था, “दुनिया का सबसे तेज़ दौड़ने वाला घोड़ा।” घोड़े के मालिक ने न तो उस घोड़े को दौड़ाया और न ही उसे फुर्तीला बनाये रखने की ट्रेनिंग दी। उसने अपने घोड़े को एक रेस में दौड़ाया, और घोड़ा आखिरी नंबर पर आया। मालिक ने फ़ौरन ही साइन बोर्ड बदल दिया , जिस पर लिखा था, “घोड़े के लिए सबसे तेज़ दुनिया।” जरुरी काम की उपेक्षा करने और निकम्मापन से लोग असफल हो जाते हैं, फिर वे किस्मत को दोष देते हैं।      


मेहनत से ही काम बनता है :

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दूरदर्शिता,साहस और गहराई के बिना जिंदगी एक अँधा तज़ुर्बा है। छोटे, कमज़ोर इरादे वाले और आलसी लोग हमेशा आसान रास्ता ढूंढ़ते हैं, ऐसा रास्ता जिसमे सबसे कम रुकावटें हों।




एथलीट्स पंद्रह सेकंड के प्रदर्शन के लिए 15 साल तक मेहनत और प्रैक्टिस करते हैं, उनसे पूछकर देखिये कि क्या वे भाग्य से जीतते हैं। एक एथलीट से पूछकर देखिये कि एक अच्छी प्रैक्टिस के बाद वह कैसा महसूस करता है। वह आपको बताएगा कि वह ऐसा महसूस करेगा जैसे उसकी शक्ति ख़त्म हो गई। अगर वह ऐसा महसूस नहीं करेगा तो इसका मतलब है कि उसने अपनी पूरी योग्यता से प्रैक्टिस नहीं की।

हारने वाले सोचते हैं कि जिंदगी ने उनके साथ नाइंसाफ किया है। वे सिर्फ अपनी अड़चनों के बारे में सोचते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि वह व्यक्ति जिसने पूरी तैयारी की और अच्छा खेला उसे भी इतनी ही अड़चने मिली हैं, लेकिन वह इनसे उबर गया है। यही एक फर्क है। उसकी पीड़ा सहने की शक्ति बढ़ जाती है क्योंकि उसकी मेहनत सिर्फ खेल में अच्छा प्रदर्शन करने तक सीमित न रहकर उसके चरित्र को भी ऊँचा उठाती है।  

भाग्य उन्ही का साथ देते हैं जो अपनी मदद खुद करते हैं :

एक बार एक गांव में बाढ़ आने के खतरे से सभी गॉंववाले गांव छोड़कर भाग रहे थे। सिवा एक आदमी के, जिसने कहा “ईश्वर मुझे बचाएगा ,मुझे पूरा भरोसा है।” पानी जब बढ़ा तो उसे बचाने के लिए एक जीप आई, मगर उस आदमी ने मना कर दिया और कहा “ईश्वर मुझे बचाएगा , मुझे पूरा भरोसा है।” जब पानी का स्तर और बढ़ा तो वह दूसरी मंज़िल पर चला गया और एक नाव उसके बचाव के लिए आई, उसने फिर इंकार कर दिया, और कहा, “ईश्वर मुझे बचाएगा, मुझे भरोसा है।” इस तरह पानी का स्तर बढ़ता रहा और वह आदमी मकान की छत पर चढ़ गया। इस बार एक हेलीकाप्टर उसे बचाने के लिए आया। उसने फिर वही बात दोहराई कि ईश्वर मुझे बचाएगा, मुझे भरोसा है और आखिरकार वह डूबकर मर गया। मारकर जब वह ईश्वर के पास पहुंचा तो उसने गुस्से से पूछा, “मुझे तुम पर भरोसा था, तुमने मेरी प्रार्थना को अनसुना क्यों किया और मुझे बचाया क्यों नहीं?” तब ईश्वर ने कहा, “तुम क्या समझते हो कि वह जीप, नाव और हेलीकाप्टर किसने भेजे थे?”       

भाग्यवादी नज़रिये से बचने का एक ही तरीका है कि हम अपनी जिम्मेदारी स्वीकारें और वजह (cause) व असर (effect) के नियमो पर भरोसा करें, न कि भाग्य पर। जिंदगी में कुछ भी हासिल करने के लिए प्रतीक्षा, अजूबे का इंतज़ार या इच्छा करने की बजाए सही कदम , तैयारी और योजना बनाने की जरुरत है।            

भाग्य योग्य व्यक्तियों का ही साथ देता है :

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एलेग्जेंडर ग्राहम अपनी पत्नी, जो ऊँचा सुनती थी, के लिए एक हियरिंग मशीन (hearing aid) बनाने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे थे। वे इस हियरिंग मशीन बनाने में तो नाकामयाब रहे, लेकिन इस दौरान उन्होंने टेलीफोन के सिद्धातों को ढूंढ निकाला। तो क्या आप ऐसे व्यक्ति को भाग्यशाली कहेंगे ?




किस्मत तभी साथ देती है जब पूरी तैयारी और अवसर, दोनों मिलते हैं। कोशिश और पूरी तैयारी के बिना, भाग्य का संयोग नहीं बनता।


भाग्य के ऊपर एक कविता है जो आपको पेश करना चाहते हैं :

भाग्य 

उसने सारा दिन काम किया
और सारी रात काम किया
उसने खेलना छोड़ा
और मौज़-मस्ती छोड़ी
उसने ज्ञान के ग्रन्थ पढ़े
और नई बातें सीखीं
वह आगे बढ़ता गया
पाने के लिए सफलता जरा-सी
दिल में विश्वास और हिम्मत लिए
वह आगे बढ़ा
और जब वह सफल हुआ
लोगों ने उसे भाग्यशाली कहा।


सफलता की रेसिपी (a receipe for success)

सफलता केक बनाने की तरह है। यदि आपके पास सही रेसिपी नहीं है, तो केक सही नहीं बनेगा। सभी सामग्री अच्छी क्वालिटी और सही मात्रा में होनी जरुरी हैं। इसे न तो आप जरुरत से ज्यादा पका सकते हैं और न ही कच्चा रख सकते हैं। एक बार आप सही रेसिपी सीख लें तो प्रैक्टिस और कभी-कभार गलतियों के बावजूद यह काम बहुत आसान हो जाएगा।




लगातार कोशिश करने और जिद करने में क्या फर्क है ? फर्क इतना ही है कि लगातार कोशिश करना दृढ संकल्प को दिखाता है, जबकि जिद मनमानी करने और अड़ियलपन को दिखाता है।

अब रेसिपी आपके हाथ में है और इसे इस्तेमाल करना आपकी मर्जी।

सफलता के कुछ मुख्य उपाय 
  • जीत के लिए खेलें हार के लिए नहीं।
  • दूसरों की गलतियों से सीखें। 
  • ऊँचे नैतिक चरित्र वाले लोगों के साथ नाता जोड़ें। 
  • जितना पाएं उससे ज्यादा दें। 
  • बिना कुछ दिए कुछ पाने की कोशिश न करें। 
  • हमेशा दूर की सोचें। 
  • अपनी ताकत को परखें और अपना निर्माण करें। 
  • हमेशा दूर तक के असर को नज़र में रखकर फैसला लें। 
  • अपनी ईमानदारी के साथ समझौता न करें।

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