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हमारे दिलों में अमर हैं “अटल बिहारी वाजपेयी” !

यह जानकार बड़ा दुख हुआ कि भारतीय राजनीति के महापुरुष अब हमारे बीच नहीं रहे। देश की रजनीति के सबसे लोकप्रिय चेहरों में से एक वाजपेयी जी ने 16 अगस्त को एम्स हॉस्पिटल में आखिरी सांस ली। इसी बीच उनके द्वारा कहा गया एक विचार याद आता है कि “मैं अभी प्रधानमंत्री हूँ। लेकिन कुछ देर में नहीं रहूंगा। लेकिन इससे मेरे मन को कोई पीड़ा नहीं होगी,कोई शोक नहीं होगा। सत्ता का खेल तो चलता रहेगा, सरकारें आएंगी ,जाएंगी। पार्टियां बनेंगी ,बिगड़ेंगी। मगर ये देश रहना चाहिए। इस देश का लोकतंत्र रहना चाहिए”।

 तो आइए दोस्तों ! इस शोक समय में आज हम इस महापुरष के जीवन के ऊपर प्रकाश डालते हैं , जिन्होंने अपने जीवन में कई महान कार्य किये।  इसके अलावा दोस्तों हमने अटल बिहारी वाजपेयी जी के ऊपर पहले भी article पोस्ट किया है , जिसे आप नीचे दी हुई link पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।   

http://stayreading.com/atal-bihari-vajpayee-biography-in-hindi/


“मैं गीत नया गाता हूँ” :

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 अटल जी यूँ ही नहीं गुनगुनाया करते थे :“मैं गीत नया गाता हूँ”। इनके द्वारा कहा गया एक शब्द लोगों के कानों में गूंजता था। लेकिन पिछले एक दशक से वाजपेयी जी मौन थे। काल के कुचक्र ने वाजपेयी जी की वाणी को हमसे छीन लिया। लेकिन आज वे पूरी तरह से मौन हो गए। लेकिन कौन कहता है कि वो हमें हमेशा के लिए छोड़ के चले गए। उन्होंने काल के कपाल पर कभी न मिटने वाली ऐसी छाप छोड़ी है , जो दुनिया में हमेशा के लिए अटल रहेगी।  

वाजपेयी जी के भाषण से तालियां रुकने का नाम नहीं लेती थी : 

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वर्ष 1991 में आम चुनाव की बात है। उन्ही दिनों अटल जी की एक जनसभा आगरा में आयोजित की गई थी। वे वहां काफी देर से पहुंचे लेकिन लोगों का जमावड़ा अटल जी के लिए वहीँ पर था। उन्होंने लगभग 40 मिनट के भाषण में देश और दुनिया के मुद्दों से वहां मौजूद हर एक व्यक्ति को ऐसे जोड़ा कि उनके लिए तालियां रुकने का नाम नहीं ले रही थी। वे सच्चे मन से दूसरों को ऐसे स्वीकारते थे कि सामने वाला उन्हें खुद अपनाने के लिए मज़बूर हो जाता था।  




कारगिल की लड़ाई में अटल जी का अहम् फैसला :

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ऐसी की घटना हम आपको बताते हैं सियाचिन की चोटियों से पाकिस्तानी सेनाओं को खदेड़ने के लिए अटल जी ने फैसला लिया कि हम सरहद पार भले ही न करें पर अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। पाकिस्तान उस समय दंग रह गया जब हमारी वायुसेना से सियाचिन की चोटियों पर स्थिर उनके शिविरों पर लगातार बम बरसाए। इसके बाद पाकिस्तान के जनरल परवेज़ मुशर्रफ यह सब देखकर सन्न रह गए ।



देश की सुरक्षा और विकास :

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आपको पता है आज हम जिन बड़े बड़े राजमार्गों पर अपनी गाड़ियां दौड़ाते हैं, वह अटल जी की ही परिकल्पना का हिस्सा है। वह देश की सुरक्षा और विकास को अच्छे से समझते थे। वे अच्छी तरह से जानते थे कि हर यात्रा का एक विराम होता है। इसलिए उन्होंने वर्ष 2005 में अपने राजनीति जीवन से विराम ले लिया । 



अटल जी के जीवन से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण बातें :

अटल जी की अद्भुत शख्सियत :

1. अटल जी पत्रकार , कवि और राजनेता के साथ साथ 11 भाषाओँ के जानकार भी थे।

2. छात्र जीवन में वामपथी विचारधारा से प्रेरित थे। वर्ष 1939 में वे इस संघ से जुड़े।

3. वर्ष 1977 में UN में हिंदी भाषण देने वाले पहले व्यक्ति बने।

4. अटल जी उत्तर प्रदेश , दिल्ली , मध्य प्रदेश और गुजरात के सांसद चुने गए।

5. पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।

अनूठी बातें 

1. पाकिस्तान के नवाज शरीफ ने अटल जी के बारे में यह कहा था कि अटल जी तो पाक में भी चुनाव जीत सकते हैं।

2. अटल जी ने कारगिल के दौरान अमेरिका से कहा था कि पाक अपनी सेना हटाए वर्ण हम सीमा पार करेंगे।



3. अटल जी ने जय जवान , जय किसान में जय विज्ञान को जोड़कर नया नारा दिया।

4. क्या आपको पता है अटल जी और उनके पिता जी ने Law course में एक साथ दाखिला लिया था।

5. वर्ष 1971 में पाक के घुटने टेकने पर अटल जी ने संसद में इंदिरा गाँधी जी को “दुर्गा” कहा था।

जीवन के अहम पड़ाव :

1. वर्ष 1942 में “भारत छोड़ो आंदोलन” में शामिल हुए। इसके तहत वे 23 दिनों तक जेल में रहे।

2. वर्ष 1954 में कश्मीर मुद्दों पर श्यामा प्रसाद मुख़र्जी संग अनशन पर बैठे।

3. वर्ष 1957 में UP के बलरामपुर से चुनाव जीतकर वहां से पहली बार सांसद बने।



4. वर्ष 1996 में 16 मई को पहली बार अटल जी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

5. वर्ष 2005 में उन्होंने राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की।

महत्वपूर्ण फैसले :

1. वर्ष 1998 मे अटल जी ने पोखरण से भारत की परमाणु ताकत मज़बूत की।

2. फरवरी 1999 में अटल जी ने दिल्ली से लाहौर के बीच बस सेवा शुरू की।

3. वर्ष 2000 में अटल जी ने दूरसंचार क्षेत्र में क्रान्ति लाने वाली नीति बनाई।

4. वर्ष 2001 में अटल जी ने बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का क़ानून बनाया।

5. वर्ष 2004 में अटल जी ने कश्मीर मुद्दे के हल के लिए अलगावादियों से वार्ता शुरू की।

सबके साथ चलने का व्यक्तित्व :

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अटल जी का एक मशहूर नारा मैं आपको सुनाना चाहता हूँ

अपमानों में ,सम्मानों में ,उन्नत मस्तक ,उभरा सीना ,
पीड़ाओं में पलना होगा ,कदम मिलाकर चलना होगा।

अटल जी अपने पूरे जीवन में अपने इसी लिखे को जीते रहे और यही वजह थी कि अपनी पार्टी के साथ साथ विपक्षी दलों में भी उनकी वाह-वाही थी। वह अपनी पार्टी के साथ भी नजर आये और विपक्ष के साथ भी कदम मिलाकर चले। इनके इसी व्यक्तित्व की वजह से उन्हें राजनीति का महापुरुष बना दिया। अटल जी ने अपना राजनीतिक जीवन पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री काल में शुरू किया था। वर्ष 1957 में वे पहली बार सांसद पहुंचे।




कहा जाता है कि शुरुआत में वाजपेयी नेहरू जी से प्रभावित रहे। नेहरू जी ने उनको देखते ही उनके अंदर की प्रतिभा पहचान ली थी। उन्होंने यह भी कहा था कि यह युवा सांसद प्रधानमंत्री बनने की योग्यता रखता है।नेहरू जी की यह भविष्यवाणी सही भी निकली। जिस तरह नेहरू जी पहले कांग्रेसी नेता रहे , ठीक उसी प्रकार वाजपेयी जी भी प्रधानमंत्री बनने वाले पहले भाजपा नेता रहे। अटल जी के व्यक्तित्व में एक ख़ास बात यह भी थी कि वह अपने प्रतिद्वंदी को कभी भी अपना विरोधी नहीं समझते थे। 

अटल जी की प्रमुख कविताएं :

“गीत नया गाता हूँ”

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती से उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात कोयल की कुहुक रात
प्राची में अरुणिम की रेख देख पाता हूँ
गीत नया गाता हूँ।

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अंतर् की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा ,रार नहीं ठानूंगा ,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ।


“ऊंचाई”

ऐसी ऊंचाई
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे ,
ऐसी ऊंचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे ,
अभिनन्दन की अधिकारी है ,
आरोहियों के लिए आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,

किन्तु कोई गोरैया ,
वहां नीड़ नहीं बना सकती ,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही
झपका सकता है।

जो जितना ऊँचा ,
उतना एकाकी होता है ,
हर भार को स्वयं ढोता है ,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

जरुरी यह है कि
ऊंचाई के साथ विस्तार भी हो ,
जिससे मनुष्य ,
ठूंठ सा खड़ा न रहे ,
औरों से घुले-मिलें ,
किसी का साथ ले ,
किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना ,
यादों में डूब जाना ,
स्वयं को भूल जाना ,
अस्तित्व का अर्थ ,
जीवन को सुगंध देता है।

धरती को बौनों की नहीं ,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे की आसमान छू लें ,
नए नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें ,
मेरे प्रभु !
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना ,
गैरों को गले न लगा सकूँ ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।


“मौत से ठन गई”

ठन गई
मौत से ठन गई।
जूझने का मेरा इरादा न था ,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वडा न था ,
रास्ता रोक कर वह कड़ी हो गई ,
यों लगा जिंदगी से बड़ी हो गई
मौत की उमर क्या है ? दो पल भी नहीं ,
जिंदगी सिलसिला , आज कल की नहीं
मैं जी भर जीया , मैं मन से मरुँ ,
लौटकर आऊंगा , कूच से क्यों डरूं ?


पुरस्कार से सम्मानित :

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27 मार्च 2015 : भारत रत्न से सम्मानित। इसी तरह अटल जी भारत रत्न से सम्मानित होने वाले सातवें प्रधानमंत्री बनें।

2015 : ‘फ्रेंड्स ऑफ़ बांग्लादेश लिबरेशन वार अवार्ड’ ! यह सम्मान बांग्लादेश सरकार द्वारा दिया गया था।

2015 : डी लिट् (मध्यप्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय)  से सम्मानित । 

1994 : भारत रत्न पंडित गोविन्द वल्लभ पंत पुरस्कार से सम्मानित। 

1994 : श्रेष्ठ सांसद पुरस्कार से सम्मानित। 

1994 : लोकमान्य तिलक पुरस्कार से सम्मानित।

1993 : डी लिट् (कानपूर विश्वविद्यालय) से सम्मानित । 

1992 : पद्म विभूषण से सम्मानित।


अटल जी का प्रभावपूर्ण भाषण :

अयोध्या एक चुनौती है :

अयोध्या एक चुनौती है जिसको अवसर में बदला जा सकता है। यह सरकार ऐसा कर पाएगी ,इसका मुझे भरो नहीं है। हाँ , मुझे इसका भरोसा नहीं है क्योंकि मैं नहीं जानता कि प्रंधानमंत्री निर्णय नहीं ले पाते हैं या उनके सहयोगी उन्हें निर्णय नहीं लेने देते हैं। अगर धृतराष्ट्र को दुर्योधन और दुशासन ने सचमुच घेर रखा है -फिर अगर वे चाहें तो भी न्याय के पथ पर नहीं चल सकते हैं। अटल जी द्वारा कहा गया यह भाषण उन्होंने 12 जून 1996 में कहा था।  




भाजपा से लड़िये लेकिन राम से नहीं :

भाजपा से आपको एक दिन लड़ना है , मगर राम से मत लड़िये। भाजपा से लड़ने का भी यह तरीका नहीं है कि प्रतिबन्ध लगा दो , उसकी मान्यता समाप्त कर दो , उसको चुनाव लड़ने से वंचित कर दो। यह भाषण अटल जी ने 21 दिसंबर 1992 में कहा था।


अटल जी द्वारा कही गई प्रमुख टिप्पणी :

संसद : 

संसद को समाज का दर्पण होना चाहिए। समाचार पत्रों को भी समाज का दर्पण होना चाहिए। लेकिन अगर संसद से तथ्य छुपाएं जायेंगे ,अगर उन्मुक्त वाद-विवाद के लिए वातावरण नहीं होगा, अगर संख्या के बल पर बात गले के नीचे उतरवाने की कोशिश की जाएगी, तो संसद राष्ट्र के हृदय का एक स्पंदन नहीं रहेगी। अन्य संस्थाओं की तरह ही एक संस्था मात्र रह जाएगी , वह कानून पर मुहर लगाएगी , मगर देश में न तो कोई बुनियादी परिवर्तन ला सकेगी और न तो देश को अराजकता की ओर जाने से रोक सकेगी। लोकसभा में बैठकर कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं अपने दायित्व का पालन नहीं कर पाता। क्या बोलें? किसके सामने बोलें ? जिन्हे सुनाना चाहते हैं वे सुनते नहीं। जो सुनते हैं वो समझ नहीं रहे हैं। जो समझ रहे हैं , वे जवाब नहीं दे रहे।

किताब :

वैसे खरीद कर पढ़ने की हमारी आदत भी कम है। हम उधार लेकर ज्यादा पढ़ते हैं। वर्ष में एक बार ख़रीदने का तो सबको संकल्प करना चाहिए। कम से कम एक – अब एक से तो कम नहीं हो सकती, आधी किताब तो आप खरीद नहीं सकते। हम घर का सामान खरीदते हैं , घर को सजाने के लिए वस्तुएँ लाते हैं। क्या घर में कुछ पुस्तकें नहीं होनी चाहिए ? पुस्तकों जैसा कोई साथी नहीं है- कोई मित्र नहीं है। पुस्तकें जड़ नहीं- चेतन होती हैं। पुस्तकें बोलती हैं- पुस्तकें गाती हैं, पुस्तकें पाठक को गुदगुदाती हैं। पुस्तकों में नवरस है। पुस्तकों में षडरिपु हैं। जब चाहे तब आप उस रस का पान कर सकते हैं।


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