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माँ का त्याग कभी नहीं भूलना चाहिए ! (Inspirational Story)

आइए दोस्तों ! आज हम आपके लिए माँ-बेटे की एक ऐसी भावुक कहानी प्रस्तुत करने जा रहे हैं, जिसे पढ़कर रमन जैसे लोगों को भी अपनी माँ का महत्व पता चलेगा क्योंकि एक माँ कभी नहीं चाहेगी कि उसका बेटा तकलीफ में रहे !चाहे बेटा माँ को कुछ न मानता हो लेकिन माँ हमेशा यही सोचती रहती है कि मेरा बेटा जहाँ भी रहे बस ! हमेशा ख़ुशी से रहे। तो दोस्तों चलिए हम आपको बताते हैं इस कहानी के बारे में जिसका नाम है “माँ का त्याग कभी नहीं भूलना चाहिए” ! 


रमन नाम का एक लड़का था , जिसकी माँ की एक आँख नहीं थी और रमन उनके कलेजे का टुकड़ा था। लेकिन रमन जो कि उनका लाडला था उसको अपनी माँ का यह रूप बिलकुल भी पसंद नहीं था। रमन के पिता की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो चुकी थी और रमन की माँ मज़दूरी करके घर का खर्चा चलाकर रमन को पढ़ाती थीं।



एक दिन रमन अपना लंच बॉक्स घर पर ही भूल गया। माँ जब लंच बॉक्स देने स्कूल पहुंची , तो सारे बच्चे उनका चेहरा देखकर हसने लगे। यह नज़ारा देखकर रमन को बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा और वह अपने दोस्तों के बीच शर्मिंदगी महसूस करने लगा।

जब रमन घर लौटा तो अपनी माँ को बुरा भला कहने लगा और उसने ठान लिया कि वह बड़ा होकर उनसे काफी दूर चला जायगा और हुआ भी कुछ ऐसा ही बाहरवीं की पढ़ाई पूरी होने के बाद रमन को Foreign University में छात्रवृत्ति मिल गयी और वह बाहर पढ़ने चला गया। रमन की पढाई होने के बाद उसकी नौकरी भी वहीँ लग गयी। वह मज़े में अपनी जिंदगी बिताने लगा।

उसके मन में कभी यह बात ही नहीं आयी कि ‘चलो ज़रा माँ से मिल आऊं’। उसकी माँ रमन को फ़ोन कर लिया करती थी लेकिन रमन बहाने बनाकर उनका फ़ोन काट दिया करता था। कुछ दिनों के बाद रमन को पता चला कि उसकी माँ का देहांत हो गया। रमन को अपनी माँ का अंतिम संस्कार करने के लिए वापिस लौटना पड़ा।

जब वह घर पहुंचा तो माँ के हाथ की लिखी चिट्ठी उसे मिली। रमन ने चिट्ठी खोली उसमे लिखा था कि “प्रिय बेटा रमन , मेरा एक पल भी तुम्हारे बारे में सोचे बगैर नहीं गुज़रता था। मुझे माफ़ कर देना क्योंकि उस दिन मेरी वजह से तुम्हारे दोस्तों के बीच तुम्हे अपमानित होना पड़ा। लेकिन एक बात मैं तुम्हे जरूर कहना चाहती हूँ जो मैंने आज तक तुमसे छुपा के रखी थी ! जब तुम छोटे थे ,तो तुम्हारे पिताजी तुम्हे घूमने ले गए थे।



तभी अचनाक किसी कार वाले ने तुम्हारे पिताजी को टक्कर मार दी थी और तुम्हारे पिताजी भगवान के प्यारे हो गए। दुर्घटना से तुम्हारी एक आंख पर भी चोट आ गयी और वह खराब हो गयी थी । लेकिन मैं नहीं चाहती थी कि तुम्हे कोई भी अलग नज़रों से देखें और जगह जगह अपमानित होना पड़े इसलिए बेटा मैंने अपनी एक आँख तुम्हे दान कर दी ।’ यह पढ़ते ही रमन सन्न रह गया और अपने व्यवहार पर अफ़सोस करने के सिवाय उसके पास दूसरा विकल्प भी नहीं बचा था !

Moral : इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि माँ का कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए क्योंकि माँ अपने बच्चों के लिए न जाने कितना कुछ त्याग कर देती है। 


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