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व्यवहार और व्यक्तित्व ही इंसान की पहचान कराता है। (कहानी)

हमने अपने प्रयासों से यह कहानी आपके लिए प्रस्तुत की है, जो आपके अंदर, अच्छे-बुरे के द्वन्द को तो ख़त्म करेगी ही साथ ही आपको आपके जीवन के प्रति निष्ठवान और दुसरो के प्रति दयालु तथा प्रत्येक स्तिथि से किस प्रकार निकला  जाए, उसमे भी आपकी सहायता  करेगी। हमारी प्रत्येक कहानी का यही उद्देश्य है कि वे आपके अंदर के अच्छे व्यक्ति को बाहर लाये तथा इससे पढ़कर आपको संतुष्टि मिले और ऐसे  विचार आये जो आपके कार्य या जीवन के लिए कारगर सिद्ध हो। 


सुमित ने स्कूल से आते ही अपना बैग दीवार पर फ़ेंक मारा । उसने सोच लिया था कि वह अब से स्कूल नहीं जायगा। जब यह बात उसकी माँ ने सुनी तो वह हैरान हो गयी ,लेकिन उस समय उसकी माँ ने सुमित से इस विषय पर कोई बात नहीं की। कुछ घंटों के बाद सुमित का गुस्सा शांत होने लगा। उसकी माँ ने सोचा कि यही अच्छा समय है इस विषय पर बात करने का।



माँ ने पूछा ‘सुमित ! स्कूल में आज कुछ हुआ था क्या ‘? और तुम्हारे पेपर भी नज़दीक आने वाले हैं ! तुम खाली क्यों बैठे हुए हो। सुमित ने कहा ‘मम्मी मुझे स्कूल में कुछ शरारती बच्चे परेशान करते रहते हैं और वो सब मुझे गरीब कहकर चिढ़ाते  रहते हैं। वो कहते हैं कि तू रोज़ रिक्शे में बैठ कर आता है और हमें रोज़ हमारा ड्राइवर कार में छोड़ने आता है’।  

माँ ने उसकी सारी बात समझ ली। उन्होंने सोचा कि वे बच्चे नासमझ होंगे तभी वे अपने पैसो पर इतना घमंड दिखा रहे हैं। माँ ने सुमित को समझया कि ‘बेटे गरीब और अमीर की कोई सीमा नहीं है। तुम्हारे स्कूल में पढ़ने वाले अमीर बच्चों से ज्यादा अमीर बच्चे हमारे इस समाज में हैं। तो अब क्या वो बहुत अच्छे बन गए ? नहीं न !! व्यक्ति अपने व्यक्तित्व से बड़ा-छोटा बनता है न कि अपने पैसों के बल पर। इसलिए तुम ये बेकार की बात छोडो और अपनी पढाई पर ध्यान दो। 

सुमित को अपनी माँ की बात समझ आ गयी और उसने उसी समय स्कूल में  “THE BEST STUDENT” का खिताब पाने के लिए मेहनत शुरू कर दी और अपनी खुद की पहचान को दुनिया के सामने लाने का निश्चय किया।  


सीख :- इस कहानी में बच्चे दो भाग में बँटे हुए हैं – अमीर और गरीब। शहरों में भौतिक समृद्धि अधिक रहती है लेकिन अक्सर बच्चों के अच्छे गुणों पर ध्यान ही नहीं दिया जाता। बचपन में ही माता-पिता के संस्कार व्यक्तित्व विकास में एक अहम् भूमिका निभाते हैं।



इसका साफ़ सीधा मतलब यह है कि अगर बचपन में बच्चे को अच्छे संस्कार मिले हैं तो वह निश्चित तौर पर अच्छे से व्यवहार करेंगे और इन सब के लिए धन दौलत की लालच इनमे कतई नहीं होती। लेकिन इसके विपरीत बिना संस्कार व व्यक्तित्व वाले किशोरों में अहंकार और घमंड कूट कूट कर भरा होता है। वे सब दूसरों को निचा दिखने की कोशिश करते रहते हैं। 

वही दूसरी ओर ऐसे बच्चे भी हैं जो महंगी चीज़ों को खरीदने में असमर्थ रहते हैं। इस वजह से वह खुद बदनसीब मानते हैं और इसी टेंशन में ग्रस्त हो जाते हैं। स्थिति तब खतरनाक हो जाते हैं जब यह किशोर टेंशन से ग्रस्त होकर अपने माता -पिता व अभिभावकों की बात को नहीं समझते हैं।

वे अपने बलबूते पर जरूरत की हर चीज़ हासिल करने के लिए गलत राह पर भी चलने को तैयार हो जाते हैं। इनमे से कुछ ऐसे स्वार्थी बन जाते हैं जो रुपयों पैसों को ही सब कुछ मान लेते हैं। उनके लिए मानवीय सम्बन्ध कुछ भी नहीं होता।

यदि हम अपनी इस कहानी पर ध्यान दें तो हमने यह पाया कि सुमित ने स्कूल न जाने का निश्चय भले ही कर लिया हो। लेकिन माँ के समझाने के बाद वह वापिस अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने लगता है और स्वयं को श्रेष्ठ बनाने में लग जाता है। यह सब उसकी माँ द्वारा बचपन में सिखाये गए संस्कार की बदौलत ही संभव हो पाया है।

इसलिए हमें भी भौतिक साधनों के पीछे भागने के बजाय रूचि के कार्यों में मन लगाना चाहिए। रूपये पैसों को तोलने के बजाये सुन्दर व्यक्तित्व को महत्व देना चाहिए। क्योंकि व्यक्ति की पहचान उसके पैसों से नहीं बल्कि उसके बढ़िया व्यवहार और व्यक्तित्व से होती है।


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