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हर तरफ गूंज रहे हैं छठ के गीत !

इन दिनों हर तरफ उत्सव के रंग बिखरे पड़े हैं। दिवाली बीतने के बाद अब पूरा माहौल छठ के गीतों से महल रहा है। यह त्योहार पहले कभी बिहार और पूर्वांचल का हुआ करता था लेकिन आज के दिन यह पूरे भारत में फ़ैल गया है। इन गीतों ने भारत की कृषक परम्परा को खूबसूरती दी है। इन्हे सुनते ही वे सारी परम्पराएं जीवित हो उठती हैं। केले ,नारियल , पकवानों की महक , तरह तरह के फलों और अन्न कूटने की परम्परा से यह एहसास और भी गहरा हो जाता है। इससे यह साबित हो जाता है कि हम किसानी परम्परा को छोड़कर बेशक शहरी परम्परा अपना रहे हों लेकिन इन सबके बीच में जुड़ाव कभी कम नहीं होता। 


छठ के गीत का श्रेय हैं शारदा सिन्हा :

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घाटों पर बढ़ती चहल-पहल के बीच बज रहे हैं छठ के गीत और इनको लोकप्रिय बनाने के श्रेय लोकगायिका शारदा सिन्हा को जाता है क्योंकि जैसे ही छठ पर्व का आगमन होता है , वैसे ही शारदा सिन्हा के गीत हर तरफ बजने लगते हैं।



‘पहिले-पहिले हम कईली छठ मइया बरत तोहार, करिहा क्षमा छठी मइया भूल-चूक गलती हमार’ जैसे गीत गाने वाली शारदा सिन्हा मानती हैं कि परम्परा और व्रत हमारे देश की संस्कृति का अभिन्न अंग है ,जिनसे हमें हमारे देश की मिट्टी से जुड़े होने का एहसास हर पल होता रहता है।   

घर-घर बजने लगते हैं छठ गीत : 

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लोकगायक और अभिनेता दिनेश लाल यादव कहते हैं कि ‘ये गीत वर्ष भर की जड़ता को ख़त्म कर देते हैं और वास्तव में जड़ों की और लौटना ही हमारी नियति है। हमें गर्व है कि इस महान परम्परा से हम जुड़े हुए हैं। इन गीतों को सुनकर ऐसा लगता है कि प्रकृति भी इसी उत्सव में शामिल है। कितना भी पत्थरदिल इंसान खड़ा हो ,वह इन गीतों को सुनकर पिघल ही जाता है।  

बदलाव के बीच कुछ रह जाता है तो वह हमारे संस्कार होते हैं। वे सदियों से बचते-बचते लोकपर्व के भीतर सांस लेते रहते हैं। इसलिए छठ के आगमन से पहले ही  घर-घर छठ के गीत बजने लगते हैं। लोग साल भर कहीं भी रहें लेकिन छठ आते ही वह भी अपने घर आने के लिए बेताब रहते हैं।

कोई भी परम्परा लोक के बिना संभव नहीं :

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वरिष्ठ साहित्यकार और मैथिली साहित्य की लेखिका उषा किरण खान के मुताबिक़ कोई भी परम्परा लोक के बिना संभव नहीं है और छठ भी ऐसा ही पर्व है। उनका कहना है कि छठ के गीतों को अगर हम सुनेंगे तो हमें ऊंच-नीच , छोटे-बड़े किसी भी तरह के भेदभाव देखने को नहीं मिलेंगे। इन गीतों में आप लोकमानस को साकार होता देख सकते हैं और यह परम्परा आज तक टूटी नहीं है और न ही कभी टूटेगी।

गीतों से मिलती है Healing Therapy :

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भोजपुरी मशहूर गायिका कल्पना का कहना है कि मुझे इन गीतों से Healing Therapy मिलती है। शहर के शोर से दूर यहाँ मन को शांति मिलती हैं। वह खुद असम से हैं और शुरुआत में वह छठ और इन गीतों से एकदम अजनबी थीं। लेकिन आज स्त्री शक्ति और पारिवारिक एकता जिस तरह से की गयी हैं उससे इस लोकपर्व की महानता सिद्ध होती है।



आज वह जब भी छठ के गीत गाती हैं तो ये सारी बातें उनके साथ सहज जुड़ती चली जाती हैं। इन गीतों का भाव औरों को भी इनसे जोड़ता है। आस्था ही सब कुछ है और छठ पर्व पर आस्था ही लोगों के जीवन में अच्छा बदलाव लाता है। 

छठ के गीत परम्परा में सम्पन्नता का प्रतीक है :

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‘बेटी बचाओ , बेटी पढ़ाओ’ ये ‘बेटी है तो कल है’ आदि जिन नारों की आज बात की जाती है। वे छठ के गीतों में पहले से ही मौजूद है। जैसे ‘पांच पुत्र एक धिया, धियवा मंगियो जरूर’ आदि इन्हे सुनकर आप अनुमान लगा सकते हैं कि हमारी ग्रामीण परम्परा से निकलकर ये सोच कितनी प्रगतिशील साबित हुई है।

इसी समाज के अंदर दूधो-नहाओ ,पूतो-फलो कली संस्कृति भी सांस लेती है पर छठ के गीतों में बेटी की मांग की कामना इस परम्परा में संपन्नता का प्रतीक है। जिस ग्रामीण जीवन को आज हम भूल बैठे हैं। आज वही छठ के गीत हमारे ग्रामीण जीवन की याद दिलाते हैं। इन सभी गीतों में स्त्रिओं का खूब योगदान है। लगता है कि स्त्रियों ने ही इन गीतों को गढ़ा है और उन्ही के बीच में से ये गीत निकलकर आये हैं।



लोक जीवन में स्त्री सदा-सर्वदा श्रेष्ठ और सम्मानीय रही है। हर गीत अलग अलग अवसर के लिए होता है और उनके लिए धुन भी अलग होती हैं। भारत में लोक उत्सव की कमी नहीं है। इसी तरह छठ के गेट की भी एक लग धुन है जिसे सुनते ही आप एक अलग एहसास को जीएंगे। 

छठ के प्रसिद्ध गीत :

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“केरवा जो फरेला घवद से , ओ पर सुगा मेडऱाये , आदित लिहो मोर अरगिया , दरस देखाव ए दीनानाथ, उगी हे सुरुजदेव , हे छठी मइया तोहर महिमा अपार , कांच ही बांस के बहँगिया , बहँगी लचकत जाए” , छठ पर्व के सबसे प्रसिद्ध गीतों में से एक है और हर वर्ष ही नए नए गीत बाजार में आ रहे हैं। छठ के गीतों का बाजार बढ़ना इस बात का संकेत है कि हम अपनी लोक परम्परा को बेहद प्यार करते हैं। हम भले ही बाकी दिनों फ़िल्मी गानों पर थिरक रहे हों लेकिन छठ के आते ही हमें छठ के गीत के अलावा और कुछ नहीं सूझता। 


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