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कैसे एक भिखारी ने बनाई करोड़ों की कंपनी !!!

आज हम एक ऐसे इंसान के बारे में बताने जा रहे हैं , जो अपनी मेहनत और लगन के दम पर करोड़पति बन गया। जो व्यक्ति कभी घर-घर जाकर भीख माँगा करता था। आज उसकी कंपनी का टर्नओवर लगभग 30 करोड़ रुपए है बल्कि उसकी कंपनी की वजह से लगभग 150 अन्य घरों में चूल्हा भी जलता है।


आप सोच रहे होंगे कि आखिर कौन? जी ! हाँ हम बात कर रहे हैं ‘रेणुका अराध्य’ की जिनकी जिंदगी की शुरुआत बेंगलुरु के निकट गोपासन्द्र गाँव से हुई | उनके पिता एक छोटे से स्थानीय मंदिर के पुजारी थे, जो अपने परिवार को दान-पुण्य से मिले पैसों से घर चलाते थे लेकिन दान-पुण्य के पैसों से उनका घर ढंग से नहीं चल पाता था इसलिए वे आस-पास गाँवों में जाकर भीख में अनाज माँग कर लाया करते थे। फिर उसी अनाज को बाज़ार में बेचकर जो पैसे मिलते उससे अपने परिवार का पालन-पोषण करते।



रेणुका भी अपने पिता की भिक्षा माँगने में मदद करते लेकिन परिवार के हालात इतने तक खराब हो गए कि एक पुजारी होने के नाते रोज पूजा-पाठ करने के बाद भी उन्हें कई घरों में जाकर नौकर का भी काम करना पड़ता था । जल्दी ही उनके पिता ने उन्हें एक आश्रम में डाल दिया। जहाँ उन्हें वेद और संस्कृत की पढ़ाई करनी पड़ती थी और वहां सिर्फ उन्हें दो वक्त का ही भोजन मिलता था – एक सुबह 8 बजे और दूसरा  रात को 8 बजे। इससे तो उनकी भूख मिटती ही नहीं थी और इसी कारण वे पढ़ाई पर ध्यान ही नहीं दे पाते और वह दसवीं की परीक्षा में फेल हो गए।

एक समय ऐसा भी आया जब उनके पिता का देहांत हो गया और उनके बड़े भाई ने भी घर छोड़ दिया। उस समय मानो उन पर पहाड़ ही टूट गया हो क्योंकि अपनी माँ और बहन की जिम्मेदारी अब उनके कन्धों पर आ गई थी | परन्तु उन्होंने यह दिखा दिया कि मुसीबत की घडी में भी उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों से कभी मुंह नहीं मोड़ा और इसी के साथ वे निकल पड़े संघर्ष की एक बहुत लंबी लड़ाई पर जिसमें उन्हें कई मुसीबतों का सामना करना पड़ा, अपनी निराशाओं से जूझना पड़ा और िष्दार उधर धक्के खाने पड़े |

इसी राह पर उन्हें कई अन्य काम भी करने पड़े जिसमे उन्हें प्लास्टिक बनाने के कारखाने और श्याम सुन्दर ट्रेडिंग कंपनी में एक मजदूर की हैसियत से काम किया और मात्र 600 रु के लिए उन्होंने  Security guard की नौकरी की। एक माली के रूप में उन्हें 15 रूपये प्रति पेड़ के लिए वे नारियल तोड़ने के लिए पेड़ पर चढ़ते थे  |

उनकी चाहत कुछ और बेहतर कर गुजरने की आदत ने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा और इसलिए उन्होंने कई बार कुछ अपना करने की भी सोची | इसके लिए उन्होंने घर-घर जाकर बैगों और सूटकेसों के कवर सिलने का काम शुरू किया, जिसमें उन्हें लगभग 30,000 रुपयों का घाटा हुआ|



उन्होंने सब कुछ छोड़कर ड्राइवर बनने का फैसला लिया पर उनके पास ड्राइवरी सिखने के भी पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने रूपये उधार लेकर और अपने शादी की अंगूठी को गिरवी रखकर ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त किया। इसके बाद उन्हें लगने लगा अब सब ठीक हो जाएगा पर किस्मत ने मानो कुछ और ही चाहा था इसलिए उन्हें एक और झटका लगा। जब उन्होंने गाड़ी में धक्का लगा देने की वजह से उन्हें अपनी पहली ड्राइवर की नौकरी से कुछ ही घंटों में हाथ धोना पड़ा|

तभी एक सज्जन टैक्सी ऑपरेटर ने उन्हें एक मौक़ा दिया और बदले में रेणुका ने बिना रुपयों के ही उनके लिए गाड़ी चलाई, ताकि वो खुद को साबित कर सके। वे दिन भर काम करते और रात भर जागकर गाड़ी को चलाने का प्रयास करते और उन्होंने ठान लिया कि में एक अच्छा ड्राइवर बन कर रहूँगा।

वह अपने यात्रियों का हमेशा ही ध्यान रखते जिससे लोगों का उन पर विश्वास बढ़ता गया और ड्राइवर के रूप में उनकी माँग बढ़ती चली गई। वे यात्रियों के अलावा हॉस्पिटल से लाशों को उनके घरों तक भी पहुँचाया करते  थे और उनका कहना था कि ,“लाशों को घर तक पहुँचाने और उसके तुरंत बाद यात्रियों को तीर्थ ले जाने से मुझे एक बहुत बड़ी चीज़ सीखने को मिली कि जीवन और मौत एक बहुत लंबी यात्रा के दो छोर ही  हैं और यदि हमें जीवन में सफल होना है तो किसी भी मौके को जाने न दें”

शुरू के चार वर्षों तक वह एक Travel Company में काम करते रहे। उसके बाद वह उस Travel Company को छोड़कर दूसरी Travel कंपनी में चले गए, जहाँ उन्हें विदेशी यात्रियों को घुमाने का भी मौक़ा मिला। विदेशी यात्रियों से उन्हें डॉलर में टिप मिलती थी। यूँ ही टिप प्राप्त कर-करके और अपनी पत्नी के P.F की मदद से उन्होंने कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर ‘City Safari’ नाम की एक कंपनी खोली। इसी कंपनी में आगे जाकर वे मैनेजर बन गए |

उन्होंने अपनी सीमाओं को परखने की ठान ली थी और बाद में उन्होनें Loan  पर एक ‘Indica’ कार ली और उसके सिर्फ डेढ़ वर्ष बाद ही उन्होंने एक और कार ले ली| रेणुका और उनकी पत्नी ने जब अपनी पहली कार खरीदी तब इन कारों की मदद से उन्होंने 2 वर्षों तक ‘स्पॉट सिटी टैक्सी’ में काम किया। पर उन्होंने सोचा “अभी मेरी मंजिल दूर है और मुझे खुद की एक ‘Travel Transport Company’ बनानी है”!और कहते हैं न कि किस्मत भी हिम्मतवालों का ही साथ देती है तो कुछ ऐसा ही रेणुका के साथ हुआ जब उन्हें यह पता चला कि ‘इंडियन सिटी टैक्सी’ नाम की एक कंपनी बिकने वाली है और वर्ष 2006 में उन्होंने उस कंपनी को 6,50,000 रुपयों में खरीद ली, जिसके लिए उन्हें अपनी सभी कारों को बेचना पड़ा। 

उन्होंने अपनी उस कंपनी का नाम बदलकर ‘प्रवासी कैब्स’ रख दिया। उसके बाद वे सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ते गए। सबसे पहले  ‘अमाज़ों India’ ने Promotion के लिए रेणुका की कंपनी को चुना और उसके बाद रेणुका ने अपनी कंपनी को और आगे बढ़ाने के लिए उसमे जी-जान लगा दी | आगे चलकर  उनके कई और नामी ग्राहक बन गए जैसे वालमार्ट, अकामाई, जनरल मोटर्स कंपनी आदि|



वह सफलता की ओर बढ़ते चले गए ,पर उन्होंने कभी सीखना बंद नहीं किया| आगे चलकर उनकी कंपनी इतनी मजबूत हो गई कि आज उनकी कंपनी की 1000 से भी ज्यादा कारें चलती है और आज वह 30 करोड़ की कंपनी के मालिक हैं और आने वाले तीन वर्षों में उनका लक्ष्य 100 करोड़ के आँकड़े को छूने का है।


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