• आखिर क्यों मनाया जाता है मुहर्रम !

    मुहर्रम !!! जो कि मुस्लिम लोगों का त्यौहार है। लेकिन क्या कोई ऐसा भी त्योहार हो सकता है, जो सिर्फ खुशी के लिए नहीं बल्कि मातम के लिए मनाया जाता हो ! शिआ मुस्लिमों द्वारा मनाया जाने वाला “मुहर्रम” एक ऐसा ही त्यौहार है। ऐसे में आपके द्वारा किसी को ‘हैप्पी मुहर्रम’ कहना भारी पड़ सकता है। इससे पहले आपका जानना बेहद जरुरी है कि मुहर्रम क्या है? क्यों शिआ मुस्लिम इस त्यौहार को मातम के रुप में मनाते हैं? आखिर वह क्यों सड़कों पर जुलूस निकालकर खुद को जख्मी करते हैं। सबसे पहले यह जानना जरुरी है कि मुहर्रम है क्या? सीधे तौर पर देखा जाये तो मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना होता है और इसका दूसरा संबंध कर्बला से है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर कर्बला में ऐसा है क्या, जो शिआ मुस्लिमों के लिए यह इतना खास स्थान है। यह वह जगह है जहां इमाम हुसैन की कब्र मौजूद

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    अपनी असफलता से कैसे सफल हुए यह सभी महापुरुष !

    हेल्लो दोस्तों ! स्वागत है आपका एक बार फिर से Stayreading.com पर। आज हम आपके लिए एक ऐसा article लेकर के आये हैं जो आपके जीवन में  motivation जरूर देगा। अक्सर आपने भी कहीं न कहीं सुना ही होगा कि अगर जीवन में कामयाब होना है तो महापुरुषों की सफल जिंदगी से ज्यादा उनकी असफल प्रयासों के बारे में पढ़ो। यह कहना ठीक भी है क्योंकि Success stories तो आपके केवल अच्छे और सफल परिणामों के बारे में बताएगी परन्तु कि हुई गलतियों से सफल होने के लिए महापुरुषों की failure stories आपको बहुत कुछ सिखाएगी । जब आप कोई भी कार्य शुरू करते हैं तो उसके असफल होने के कई कारण भी होते हैं परन्तु इसका मतलव यह नहीं कि आप उस कार्य को करना ही छोड़ दें। अगर आप किसी कार्य में असफल होते हैं तो समझ लीजिये कि अपने सफलता की एक सीढ़ी पर चढ़ चुके हैं

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    माँ का त्याग कभी नहीं भूलना चाहिए ! (Inspirational Story)

    आइए दोस्तों ! आज हम आपके लिए माँ-बेटे की एक ऐसी भावुक कहानी प्रस्तुत करने जा रहे हैं, जिसे पढ़कर रमन जैसे लोगों को भी अपनी माँ का महत्व पता चलेगा क्योंकि एक माँ कभी नहीं चाहेगी कि उसका बेटा तकलीफ में रहे !चाहे बेटा माँ को कुछ न मानता हो लेकिन माँ हमेशा यही सोचती रहती है कि मेरा बेटा जहाँ भी रहे बस ! हमेशा ख़ुशी से रहे। तो दोस्तों चलिए हम आपको बताते हैं इस कहानी के बारे में जिसका नाम है “माँ का त्याग कभी नहीं भूलना चाहिए” !  रमन नाम का एक लड़का था , जिसकी माँ की एक आँख नहीं थी और रमन उनके कलेजे का टुकड़ा था। लेकिन रमन जो कि उनका लाडला था उसको अपनी माँ का यह रूप बिलकुल भी पसंद नहीं था। रमन के पिता की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो चुकी थी और रमन की माँ मज़दूरी करके घर का खर्चा चलाकर

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    कृष्ण दीवानी “मीराबाई” का जीवन परिचय !

    मीराबाई हिंदी साहित्य जगत की कवियत्रियों में अग्रणीय स्थान रखती हैं | मीराबाई ने इस संसार को कई कविताएं, दोहे, पद आदि प्रदान किए हैं जिनका यह संसार सदैव ऋणी रहेगा। इनकी कविताएं, दोहे एवं पद प्रमुखता कृष्ण भक्ति पर आधारित है | महान कवयित्री मीराबाई का जन्म वर्ष 1573 में जोधपुर में चोकड़ी नामक गाँव में हुआ था। मीरा बाई 16वी शताब्दी की हिन्दू आध्यात्मिक कवियित्री और भगवान कृष्णा की भक्त थी। लोगो के अनुसार संत मीराबाई एक आध्यात्मिक कवियित्री थी और उत्तर भारतीय हिन्दू परंपरा के अनुसार वह एक भक्ति संत थी। इनका बचपन से ही कृष्णभक्ति में रुचि थी एवं यह मंदिरों में जाकर वहाँ मौजूद कृष्णभक्तों के सामने कृष्ण जी की मूर्ति के आगे नाचती रहती थीं। मीराबाई दिन-रात कृष्णा भक्ति में ही लीन रहती और कृष्णा को ही अपना पति मानती थी। भगवान कृष्णा के रूप का वर्णन करते हुए संत मीराबाई हजारो भक्तिमय कविताओ

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    महिला पहलवान “Geeta Phogat” की Success Story !

    नाम : गीता फोगाट जन्म :15 दिसम्बर 1988 ,हरियाणा -बिलाली गांव ! पिता : महावीर सिंह फोगाट माता : दया कौर खेल : पहलवानी उपलब्धियां : राष्ट्रमंडल खेलों में गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गयीं। पहली भारतीय महिला पहलवान है जिन्होंने ओलम्पिक में qualify किया। इनके जीवन पर आधारित फिल्म दंगल बॉलीवुड की हिट फिल्मों में से एक है। गीता फोगाट एक ऐसे गाँव से थीं जहाँ बेटी का होना अभिशाप माना जाता था। बेटी के पैदा होते ही खुशियों की जगह दुःख का मातम छा जाता था। इतना ही नहीं लड़कियों को पढ़ने के लिए स्कूल जाना भी मना था और आज भी हमारे देश में केवल बेटों की चाह रखने वाले लोगों की कमी नहीं है । शुरुआत में तो  गीता के माता-पिता की भी सोच कुछ ऐसी ही थी। बेटे की चाह में वह चार बेटियों के पिता बन गए, जिनमे गीता सबसे बड़ी हैं। लेकिन

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    कैसे बने “Suhas Gopinath” दुनिया के सबसे कम उम्र के CEO !

    आज हम आपको एक ऐसे शख्स से मिलवाने जा रहे हैं  जो दुनिया का  Youngest CEO है । क्या आप जानते हैं कि यह पद बहुत ही जिम्मेदारी भरा है। तो ज़रा सोचिये इतनी काम उम्र वाला यह व्यक्ति इतना कैसे manage करता होगा। यह व्यक्ति कोई foreigner नहीं है बल्कि अपने India से belong करता है जिसने अपनी पढाई बीच में ही छोड़ दी और दुनिया का youngest CEO बन गया । तो आइये हम आपको दुनिया के youngest CEO की सफलता भरी जिंदगी के बारे में बताते हैं :- ‘सुहास गोपीनाथ ‘ जिन्होंने  Global Inc की स्थापना की  थी तो वह सिर्फ चौदह वर्ष के थे और तब उन्हें खुद भी नहीं पता था कि वो दुनिया के सबसे कम उम्र के CEO बन गए हैं। उन्होंने यह काम Bangalore के एक छोटे से Cyber-Cafe में बैठ कर किया था और आज Globals Inc एक multi-million dollar company

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    रिक्शेवाले का बेटा बना IAS Officer !!!

    आज  मैं  एक  ऐसे व्यक्ति की  कहानी  बताने जा  रहा  हूँ  जो  हज़ारो  दिक्कतों  के  बावजूद  अपने  दृढ  निश्चय  और  मेहनत  के  बल  पर  IAS officer बनने में सक्षम हो सका क्योंकि प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में परीक्षार्थी IAS officer बनने  की  चाह  में  Civil Services के exam में  बैठते  हैं  पर  इनमे  से 0.025 % से  भी  कम  लोग  IAS officer बन  पाते हैं ।इससे आप आसानी से  अंदाज़ा  लगा  सकते  हैं  कि  IAS exam Clear करना कितना  मुश्किल है और जो  कोई  भी  इस  exam को  clear करता  है  उसके  लिए  समाज में  एक  अलग  ही छवि बन  जाती  है और  यह सब करने  वाला  किसी  बहुत  ही  साधारण  Family background से  हो  तो  उसके  लिए  तो मन  में  और  भी  respect आना  आवश्यक है। मैं बात कर रहा हूँ “गोविन्द जायसवाल” की ! जिनके पिता  एक  रिक्शा -चालक  थे। बनारस  की तंग गलियों  में एक छोटे से

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    कैसे एक भिखारी ने बनाई करोड़ों की कंपनी !!!

    आज हम एक ऐसे इंसान के बारे में बताने जा रहे हैं , जो अपनी मेहनत और लगन के दम पर करोड़पति बन गया। जो व्यक्ति कभी घर-घर जाकर भीख माँगा करता था। आज उसकी कंपनी का टर्नओवर लगभग 30 करोड़ रुपए है बल्कि उसकी कंपनी की वजह से लगभग 150 अन्य घरों में चूल्हा भी जलता है। आप सोच रहे होंगे कि आखिर कौन? जी ! हाँ हम बात कर रहे हैं ‘रेणुका अराध्य’ की जिनकी जिंदगी की शुरुआत बेंगलुरु के निकट गोपासन्द्र गाँव से हुई | उनके पिता एक छोटे से स्थानीय मंदिर के पुजारी थे, जो अपने परिवार को दान-पुण्य से मिले पैसों से घर चलाते थे लेकिन दान-पुण्य के पैसों से उनका घर ढंग से नहीं चल पाता था इसलिए वे आस-पास गाँवों में जाकर भीख में अनाज माँग कर लाया करते थे। फिर उसी अनाज को बाज़ार में बेचकर जो पैसे मिलते उससे अपने परिवार

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    कैसे एक बस कंडक्टर बना सुपरस्टार !!!

    आज हम ऐसी महान हस्ति के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने फर्श से अर्श तक आने की कहावत को सच साबित करके बताया। जी हाँ ! हम बात कर रहे हैं सुपरस्टार “रजनीकांत” जी की। जिन्होंने बड़ी बड़ी सफलताएं हासिल कर अपने अभावों और संघर्षों में इतिहास रचा है और वैसा शायद पूरी दुनिया में कम ही लोग कर पाएं होंगे क्योंकि एक कारपेंटर से कुली बनना फिर कुली से बी.टी.एस. कंडक्टर और फिर एक कंडक्टर से विश्व के सबसे ज्यादा प्रसिद्ध सुपरस्टार बनने तक का सफ़र कितना परिश्रम भरा होगा ये हम सब सोच ही सकते हैं। जिस स्थान पर आज रजनीकांत हैं उसके लिए जितना परिश्रम और त्याग चाहिए होता है शायद रजनीकांत जी ने उससे कहीं ज्यादा किया है| रजनीकांत जी का जन्म 12 दिसम्बर 1950 को कर्नाटक के बैंगलोर में एक मध्यमवर्गीय मराठी परिवार में हुआ था।  वे अपने परिवार में सबसे छोटे थे। 

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    Wilma Rudolph-“जिन्होंने साबित कर दिया कि Nothing is Impossible!

    आइए दोस्तों ! आज हम आपको एक ऐसी महिला के बारे में बताने जा रहे हैं जिसने यह साबित कर दिया कि दुनिया में कुछ  भी असंभव नहीं है।   “विल्मा रुडोल्फ” का जन्म अमेरिका के एक गरीब घर में हुआ था। लगभग चार साल की उम्र में विल्मा रूडोल्फ को पोलियो हो गया और वह विकलांग हो गई।  विल्मा रूडोल्फ तब केलिपर्स के सहारे चलती थी। डाक्टरों ने भी हार मान ली और कह दिया कि वह कभी भी जमीन पर चल नहीं सकती । विल्मा रूडोल्फ की मां ने विल्मा रूडोल्फ को प्रेरित किया और कहा कि “तुम कुछ भी कर सकती हो और इस संसार में नामुमकिन कुछ भी नहीं है। तभी विल्मा रूडोल्फ ने अपनी माँ से कहा कि ‘‘क्या मैं दुनिया की सबसे तेज धावक बन सकती हूं ?’’ उसकी माँ ने कहा कि “ईश्वर पर विश्वास, मेहनत और लगन से तुम जो चाहो वह

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